इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, सेमीकंडक्टर और स्मार्टफोन उद्योग में इस्तेमाल होने वाले क्रिटिकल मिनरल्स को लेकर भारत ने बड़ी रणनीति तैयार की है। चीन के लंबे समय से चले आ रहे दबदबे को चुनौती देने के लिए भारत अब वैश्विक स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करने में जुट गया है।
भारत ने क्वाड देशों के साथ मिलकर करीब 20 अरब डॉलर के सहयोग और निवेश की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। इसके साथ ही सरकार ने 34,300 करोड़ रुपये के घरेलू मिशन के जरिए दुर्लभ खनिजों की खोज, खनन और प्रोसेसिंग क्षमता बढ़ाने की योजना बनाई है। इसका उद्देश्य लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और रेयर अर्थ एलिमेंट्स जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति को सुरक्षित करना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान में इन खनिजों की प्रोसेसिंग और सप्लाई चेन में चीन की मजबूत पकड़ है, जिससे दुनिया के कई देश उस पर निर्भर हैं। भारत इस निर्भरता को कम करने के लिए ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका जैसे साझेदार देशों के साथ मिलकर वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने पर काम कर रहा है।
सरकार का लक्ष्य भारत को आने वाले वर्षों में क्रिटिकल मिनरल्स प्रोसेसिंग का वैश्विक केंद्र बनाना है। इससे न केवल इलेक्ट्रिक वाहन और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग को मजबूती मिलेगी, बल्कि देश की रणनीतिक और आर्थिक सुरक्षा भी बढ़ेगी।
विश्लेषकों के अनुसार यह पहल भारत को हरित ऊर्जा और उन्नत तकनीक के क्षेत्र में नई ताकत देने के साथ-साथ चीन के एकाधिकार को चुनौती देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।

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