प्रणव बजाज
देश में जब भी किसी मंदिर में चढ़ावे की चोरी, दानपात्र से रकम गायब होने या हिसाब-किताब में गड़बड़ी की खबर आती है, तो कुछ दिनों तक हंगामा होता है, बयान आते हैं, जांच की मांग उठती है और फिर मामला धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चला जाता है। लेकिन सवाल वहीं का वहीं खड़ा रहता है—आखिर मंदिरों की आस्था और श्रद्धा से जुड़े धन की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है?
भक्त अपनी मेहनत की कमाई का हिस्सा भगवान को समर्पित करते हैं। कोई सौ रुपये डालता है, कोई लाखों का दान करता है। लेकिन जब उसी धन पर चोरी, घोटाले या अव्यवस्था की खबरें सामने आती हैं, तो चोट सिर्फ पैसों पर नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था पर लगती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब बैंक, सरकारी खजाने, टोल प्लाजा और यहां तक कि छोटी दुकानों तक की निगरानी के लिए आधुनिक व्यवस्था बनाई जा सकती है, तो करोड़ों रुपये के चढ़ावे वाले मंदिरों में पारदर्शी और जवाबदेह तंत्र क्यों नहीं बनाया जाता? सरकारें बदलती रहती हैं, समितियां बनती रहती हैं, लेकिन मंदिरों की आय और खर्च का एक समान राष्ट्रीय मॉडल आज तक क्यों नहीं बन पाया?
विडंबना देखिए, चोरी होने के बाद पुलिस जांच शुरू होती है, लेकिन चोरी रोकने के लिए पहले से कोई सशक्त व्यवस्था खड़ी करने की चर्चा कम ही दिखाई देती है। यदि बड़े मंदिरों में स्वतंत्र ऑडिट, डिजिटल रिकॉर्ड, सीसीटीवी निगरानी और सार्वजनिक लेखा-जोखा अनिवार्य हो सकता है, तो इसे व्यापक स्तर पर लागू करने में बाधा क्या है?
दुर्भाग्य यह भी है कि ऐसे मामलों को कई बार राजनीतिक चश्मे से देखा जाने लगता है। कोई इसे सरकार की विफलता बताता है, कोई विपक्ष की साजिश, तो कोई धार्मिक संस्थाओं पर सवाल उठाने लगता है। परिणाम यह होता है कि मूल मुद्दा—पारदर्शिता और जवाबदेही—बहस से गायब हो जाता है।
मंदिर किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं हैं। वे करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र हैं। इसलिए चोरी या वित्तीय अनियमितता का हर मामला केवल कानूनी नहीं, सामाजिक और धार्मिक चिंता का विषय भी होना चाहिए। ऐसी घटनाएं जब बार-बार सामने आती हैं, तो बदनामी किसी व्यक्ति या समिति की नहीं, बल्कि पूरे धार्मिक तंत्र की होती है।
जरूरत किसी धर्म को कटघरे में खड़ा करने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिसमें दान की हर पाई का हिसाब हो, हर लेन-देन दर्ज हो और हर जिम्मेदार व्यक्ति जवाबदेह हो। आस्था को सुरक्षा चाहिए, राजनीति नहीं।
वरना स्थिति यही रहेगी कि भक्त भगवान पर भरोसा करके दान देता रहेगा और व्यवस्था भगवान के भरोसे चलती रहेगी।

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