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तबादला एक्सप्रेस के ड्राइवर: मुख्यमंत्री मोहन यादव?Transfer Express Driver: Chief Minister Mohan Yadav?

 

प्रणव बजाज

मध्य प्रदेश में इन दिनों एक नई पहचान तेजी से बन रही है। लोग अब यह कम पूछते हैं कि सरकार कौन चला रहा है और यह ज्यादा पूछते हैं कि अगला तबादला किसका होने वाला है। ऐसा लगता है कि प्रदेश में मंत्रालयों से ज्यादा व्यस्त अगर कोई विभाग है तो वह है तबादला विभाग।


मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व वाली सरकार ने पिछले कुछ दिनों में तबादलों की ऐसी रफ्तार दिखाई है कि सरकारी कर्मचारी भी हैरान हैं। आंकड़े बताते हैं कि महज 16 दिनों में 17 हजार से अधिक अधिकारी-कर्मचारियों के तबादले हुए। यानी औसतन हर दिन एक हजार से ज्यादा तबादले। यह प्रशासनिक व्यवस्था है या कोई रिकॉर्ड बनाने की प्रतियोगिता, यह समझना मुश्किल हो गया है।

सरकारी दफ्तरों में आजकल विकास योजनाओं से ज्यादा चर्चा तबादला सूचियों की होती है। अधिकारी सुबह कुर्सी संभालते हैं और शाम तक यह चिंता करने लगते हैं कि अगला आदेश कहीं उनका पता तो नहीं बदल देगा। कुछ लोग मजाक में कहने लगे हैं कि अब सरकारी पहचान पत्र के साथ एक सूटकेस भी स्थायी रूप से जारी कर देना चाहिए।

मुख्यमंत्री मोहन यादव बार-बार सुशासन और प्रशासनिक सुधारों की बात करते हैं। लेकिन सवाल यह है कि यदि किसी अधिकारी को किसी जिले की समस्याएं समझने, टीम बनाने और काम शुरू करने का समय ही नहीं मिलेगा तो परिणाम कैसे आएंगे? विकास कोई क्रिकेट का टी-20 मैच नहीं है कि आते ही चौके-छक्के लग जाएं। प्रशासन को समय चाहिए, स्थिरता चाहिए और जवाबदेही चाहिए।

जनता के बीच यह धारणा भी मजबूत होती जा रही है कि प्रदेश में ट्रांसफर केवल प्रशासनिक जरूरत नहीं बल्कि एक समानांतर व्यवस्था बन चुके हैं। हर तबादला गलत हो, ऐसा कहना उचित नहीं होगा, लेकिन जब संख्या हजारों में पहुंच जाए तो सवाल उठना स्वाभाविक है। आखिर इतनी बड़ी संख्या में अधिकारियों को अचानक बदलने की जरूरत क्यों पड़ी?

विपक्ष में रहते हुए भाजपा अक्सर तबादला उद्योग पर सवाल उठाती थी। तब कहा जाता था कि सरकारें ट्रांसफर-पोस्टिंग को कमाई का जरिया बना रही हैं। अब जब सत्ता में भाजपा और मुख्यमंत्री मोहन यादव हैं, तो जनता पूछ रही है कि क्या पुरानी बीमारी खत्म हुई या सिर्फ डॉक्टर बदल गया?

नौकरशाही का काम नीतियों को जमीन पर उतारना होता है। लेकिन जब अधिकारी अपना अधिक समय फाइलों से ज्यादा रिलीविंग और जॉइनिंग में बिताने लगें, तो नुकसान सीधे जनता को होता है। अस्पतालों की योजनाएं अटकती हैं, शिक्षा सुधार रुकते हैं और विकास कार्यों की निरंतरता टूटती है।

मध्य प्रदेश की जनता को यह फर्क नहीं पड़ता कि किस अधिकारी का तबादला हुआ। उसे यह फर्क पड़ता है कि सड़क बनी या नहीं, अस्पताल में डॉक्टर हैं या नहीं, बिजली आ रही है या नहीं। लेकिन जब पूरा प्रशासन ही तबादलों के भंवर में फंस जाए तो विकास का पहिया भी डगमगाने लगता है।

इसलिए सवाल मुख्यमंत्री मोहन यादव से है। क्या प्रदेश में प्रशासनिक सुधार हो रहे हैं या तबादला उद्योग अपने चरम पर है? क्या अधिकारियों की क्षमता का उपयोग हो रहा है या केवल कुर्सियां बदलने का खेल चल रहा है?

कहीं ऐसा तो नहीं कि मध्य प्रदेश में अब सरकार से ज्यादा तेज़ी से सिर्फ "मोहन यादव तबादला एक्सप्रेस" दौड़ रही है?

— प्रणव बजाज

(यह व्यंग्य सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तबादला आंकड़ों और प्रशासनिक घटनाक्रम पर आधारित टिप्पणी है। इसका उद्देश्य जनहित के सवाल उठाना है, किसी व्यक्ति पर तथ्यहीन आरोप लगाना नहीं।)

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