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तारों के जाल में फंसा इंदौर: ‘स्वच्छ शहर’ या ‘बिजली का स्पाइडर-वेब मॉडल’?Indore trapped in a web of wires: 'Clean city' or 'spider-web model of electricity'?

विशेष | प्रणव बजाज

इंदौर, जिसे लोग कभी “स्वच्छता का सिरमौर” कहते थे, अब धीरे-धीरे एक नए खिताब की ओर बढ़ता दिख रहा है—“तारों के सबसे बड़े जाल का जीवित उदाहरण।” शहर की गलियों में अगर ऊपर नजर उठाकर देख लें तो ऐसा लगता है जैसे बिजली विभाग ने Google Maps की बजाय मकड़ी से नेटवर्क डिज़ाइन करवाया हो।



खंभे कम, अतिक्रमण ज्यादा

शहर के कई इलाकों में बिजली के खंभे अब सिर्फ बिजली देने के लिए नहीं, बल्कि स्थानीय अतिक्रमण प्रतियोगिता के विजेता ट्रॉफी स्टैंड बन चुके हैं। कहीं खंभे के पास दुकान है, कहीं दुकान के ऊपर खंभा है—और बीच में बिजली विभाग खड़ा सोच रहा है कि आखिर गलती किसकी है।

खुले ट्रांसफार्मर ऐसे रखे गए हैं जैसे लिखा हो—“यहाँ हाथ डालना मना है… लेकिन जोखिम आपका अपना है।”

तारों का ऐसा जाल कि स्पाइडरमैन भी रास्ता भूल जाए

पुराने शहर से लेकर नई कॉलोनियों तक बिजली के तारों की स्थिति देखकर लगता है कि हर साल “तार बिछाओ, पुरस्कार पाओ” प्रतियोगिता चलती रही है। कहीं तार इतने नीचे हैं कि लोग बाल कटवाने से पहले “हेयरकट” नहीं, “हेड-लाइन चेक” करते हैं।

बारिश आती है तो बिजली विभाग भी मौसम पूर्वानुमान से ज्यादा सक्रिय हो जाता है—लेकिन सिर्फ ट्रिपिंग रिकॉर्ड करने में।

पिथमपुर का दर्द: मशीनें भी अब छुट्टी मांग रही हैं

औद्योगिक क्षेत्र पिथमपुर में उद्योगों की हालत ऐसी है कि मशीनें अब खुद वोल्टेज देखकर काम करने से इनकार करने लगी हैं। कभी बिजली आती है, कभी जाती है—और बीच में उत्पादन लाइन सिर्फ “सोच-विचार मोड” में चलती रहती है।

उद्योगपति कहते हैं—“हमने मशीनें नहीं खरीदी थीं, हमने बिजली के साथ लॉटरी खरीदी थी।”

भ्रष्टाचार: आरोपों का वह तार जो कभी नहीं टूटता

बिजली विभाग से जुड़े कुछ मामलों में रिश्वत और अनियमितताओं के आरोप समय-समय पर सामने आते रहे हैं। लेकिन यह भी सच है कि हर आरोप के बाद सिस्टम एक नया बयान जारी करता है—“जांच चल रही है।”

यह जांच इतनी लंबी चलती है कि लोग उसे भी बिजली कटौती जैसा ही मान लेते हैं—अनिश्चित और अनिवार्य।

बिजली चोरी: जनता को हमेशा ‘शॉर्ट सर्किट’ का शक क्यों होता है?

बिजली चोरी को लेकर चर्चाएं ऐसी हैं जैसे हर मोहल्ले में कोई न कोई “गुप्त तकनीशियन” छुपा बैठा हो। हालांकि विशेषज्ञ बताते हैं कि बिना जांच किसी निष्कर्ष पर पहुंचना ठीक नहीं, लेकिन आम जनता का भरोसा हर ट्रिपिंग के साथ थोड़ा-थोड़ा गिरता जरूर जाता है।

जनता की शिकायतें: अब शिकायत भी स्मार्ट हो गई है

अब लोग सोशल मीडिया पर शिकायत करते हैं—“लाइट गई है”—और जवाब आता है—“स्मार्ट मीटर अपडेट हो रहा है।”

मतलब बिजली जाए या न जाए, “स्मार्ट” होना जरूरी है।

सबसे बड़ा सवाल: जिम्मेदार कौन?

इंदौर की बिजली व्यवस्था में समस्या एक नहीं, कई लेयर वाली है—जैसे प्याज, बस इसमें आंसू तकनीकी भी हैं और प्रशासनिक भी।

खंभे कौन देखेगा?

तार कौन सुधारेगा?

ट्रांसफार्मर कौन सुरक्षित करेगा?

और जवाबदेही किसकी होगी?

इन सवालों के जवाब अक्सर एक ही फाइल में रखे जाते हैं—जिस पर लिखा होता है: “फिलहाल विचाराधीन।”

निष्कर्ष: शहर आगे बढ़ रहा है, तार पीछे नहीं हट रहे

इंदौर विकास की दौड़ में आगे जरूर है, लेकिन बिजली के तार शायद अब भी पुराने नक्शे पर चल रहे हैं। शहर स्मार्ट बन रहा है, पर तारों का जाल अब भी “पुराने नेटवर्क” पर अटका है।

और जनता? वह हर ट्रिपिंग के बाद बस इतना ही कहती है—

“स्वच्छ इंदौर तो ठीक है… अब थोड़ा ‘सुरक्षित इंदौर’ भी बना दो।”

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