मुख्यमंत्री मोहन यादव, नौकरशाही और सरकार की जेब खाली, जनता की जेब तैयार!
प्रणव बजाज
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की सरकार एक बार फिर 2500 करोड़ रुपये से अधिक का नया कर्ज लेने जा रही है। सरकार कह रही है कि पैसा विकास कार्यों में लगेगा। जनता पूछ रही है—"पिछले लाखों करोड़ के कर्ज का विकास आखिर गया कहां?
प्रदेश में कर्ज लेने की रफ्तार ऐसी है मानो सरकार नहीं, कोई क्रेडिट कार्ड कंपनी चल रही हो। हर कुछ महीनों में नया कर्ज, नई घोषणा, नया शिलान्यास और फिर जनता के लिए पुराने वादों की नई पैकिंग।
मुख्यमंत्री मोहन यादव मंचों से विकास की गाथा सुनाते हैं, जबकि दूसरी तरफ वित्त विभाग के अफसर बाजार में नई उधारी की तैयारी करते नजर आते हैं। ऐसा लगता है कि मंत्रालय में अब विकास की नहीं, कर्ज जुटाने की प्रतियोगिता चल रही हो। जिस विभाग को जितना पैसा चाहिए, वह उतनी बड़ी फाइल लेकर पहुंच जाता है और अंत में समाधान निकलता है—"कर्ज ले लो।"
प्रदेश की नौकरशाही भी कमाल की है। वातानुकूलित कमरों में बैठकर ऐसी योजनाएं बनती हैं कि कागजों पर मध्य प्रदेश कभी सिंगापुर तो कभी दुबई नजर आने लगता है। फाइलों में पुल, सड़कें, स्मार्ट शहर और विकास के सपने दौड़ते हैं, लेकिन जमीन पर अक्सर जनता गड्ढों और समस्याओं से जूझती मिलती है।
व्यवस्था का सबसे रोचक पहलू यह है कि कर्ज लेने का फैसला मंत्री और अफसर करते हैं, लेकिन उसे चुकाने की जिम्मेदारी किसान, मजदूर, कर्मचारी, व्यापारी और मध्यम वर्ग पर डाल दी जाती है। मंत्री जी का वेतन चलता रहेगा, अफसरों की गाड़ियां दौड़ती रहेंगी, सरकारी बंगले आबाद रहेंगे, लेकिन टैक्स देने वाला नागरिक हर साल नए बोझ का सामना करेगा।
जनता के मन में सवाल है कि यदि हर साल हजारों करोड़ का नया कर्ज लिया जा रहा है तो क्या सरकार कभी खर्चों में कटौती, फिजूलखर्ची पर नियंत्रण और जवाबदेही की भी बात करेगी? या फिर आने वाली पीढ़ियों के सिर पर भी कर्ज का पहाड़ रखकर इसे विकास का मॉडल बताया जाएगा?
आज स्थिति यह है कि मुख्यमंत्री मोहन यादव विकास के नाम पर कर्ज का नया अध्याय खोल रहे हैं और नौकरशाही आंकड़ों की ऐसी बाजीगरी दिखा रही है कि घाटा भी उपलब्धि लगने लगे। लेकिन सच यही है कि सरकार चाहे जितना कर्ज ले, उसकी असली गारंटी प्रदेश की जनता ही होती है।
व्यंग्य का निष्कर्ष:
प्रदेश में एक नया नारा चल सकता है—
"कर्ज लो, उत्सव मनाओ,
फीता काटो, फोटो खिंचवाओ।
मंत्री-अफसर मौज उड़ाएं,
बिल जनता के घर पहुंचाओ!"

Post a Comment