प्रणव बजाज
मध्य प्रदेश में इन दिनों एक नई कहावत बड़ी तेजी से चल रही है—"अगर कोई अधिकारी, नेता, ठेकेदार, दबंग, गुंडा, कार्यकर्ता या प्रभावशाली व्यक्ति मिल जाए, तो पहले उसका परिचय मत पूछो, सीधा पूछो—भाई साहब, आप भी क्या मुख्यमंत्री जी के रिश्तेदार हैं?
"
प्रदेश का माहौल ऐसा है कि चौराहे की चाय दुकान से लेकर सचिवालय के गलियारों तक एक ही चर्चा है। कोई ट्रांसफर रुकवा दे तो लोग कहते हैं, "भाई होंगे।" कोई ठेका ले जाए तो जवाब मिलता है, "अपने आदमी हैं।" कोई कानून से ऊपर दिखाई दे तो फुसफुसाहट शुरू हो जाती है, "अरे छोड़ो, बड़े लोगों से संबंध हैं।"
राजनीति में यह नया गणित बड़ा दिलचस्प है। पहले लोग विकास, सड़क, अस्पताल और रोजगार पर बहस करते थे। अब बहस इस बात पर होती है कि किसकी पहुंच कहां तक है। कौन किसका आदमी है, कौन किसके साथ फोटो खिंचवा चुका है और कौन किसके नाम का इस्तेमाल करके अपना रुतबा बढ़ा रहा है।
मध्य प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक नया सिद्धांत चल पड़ा है। संविधान की किताब में भले ही इसका जिक्र न हो, लेकिन सत्ता के गलियारों में यह सिद्धांत खूब लोकप्रिय है—"जो जितना करीब, उसका उतना नसीब।"
प्रदेश में कोई नेता अचानक ताकतवर हो जाए, कोई अधिकारी नियमों को जेब में लेकर घूमता दिखाई दे, कोई ठेकेदार करोड़ों के काम ले जाए, कोई दबंग कानून को ठेंगा दिखाता नजर आए, तो आम आदमी के पास एक ही जवाब होता है—"भाई, ऊपर तक पहुंच है।"
कहते हैं लोकतंत्र में जनता मालिक होती है। लेकिन मध्य प्रदेश का आम नागरिक कभी-कभी सोचता है कि मालिक वह है या सिर्फ वोट डालने वाली मशीन। क्योंकि सत्ता के असली दरबार में प्रवेश का टिकट योग्यता नहीं, बल्कि पहचान और पहुंच लगती है।
चौराहे पर चाय बेचने वाला रामलाल भी अब राजनीति का अच्छा विश्लेषक बन गया है। वह कहता है, "साहब, यहां सड़क बनने से पहले यह देखा जाता है कि ठेका किसका है। पोस्टिंग होने से पहले यह देखा जाता है कि सिफारिश किसकी है। और कार्रवाई होने से पहले यह देखा जाता है कि आरोपी किसका आदमी है।"
प्रदेश में इन दिनों एक अजीब माहौल है। हर दूसरा आदमी किसी न किसी बड़े नेता का करीबी निकल आता है। यदि कोई अफसर विवादों में घिर जाए तो उसके समर्थक कहते हैं—"साहब ईमानदार हैं, उन्हें फंसाया जा रहा है।" यदि कोई नेता पर आरोप लगे तो जवाब आता है—"राजनीतिक साजिश है।" यदि कोई दबंग कानून तोड़ दे तो कहा जाता है—"गलतफहमी हो गई होगी।"
जनता हैरान है कि आखिर प्रदेश में इतने महान लोग एक साथ कहां से पैदा हो गए, जिनके खिलाफ हर आरोप झूठा और हर कार्रवाई साजिश निकलती है।
राजनीति के जानकार बताते हैं कि सत्ता का सबसे बड़ा आकर्षण कुर्सी नहीं, बल्कि उसके आसपास पैदा होने वाला "अदृश्य संरक्षण कवच" होता है। इस कवच के अंदर रहने वाले लोगों को लगता है कि नियम-कानून सिर्फ आम जनता के लिए बने हैं। उनके लिए तो फोन कॉल, सिफारिश और परिचय ही सबसे बड़ा कानून है।
मध्य प्रदेश में आज सबसे बड़ा संकट विपक्ष का नहीं, प्रशासन का नहीं, बल्कि विश्वास का है। जनता धीरे-धीरे यह मानने लगी है कि व्यवस्था में दो तरह के नागरिक हैं। एक वे जो लाइन में खड़े रहते हैं और दूसरे वे जिनके लिए लाइन हट जाती है।
जब किसी गरीब किसान की फाइल महीनों अटकती है और किसी रसूखदार का काम घंटों में हो जाता है, तब लोकतंत्र कमजोर होता है। जब किसी बेरोजगार युवक को नौकरी के लिए दर-दर भटकना पड़ता है और कोई सिफारिशी व्यक्ति सीधे कुर्सी तक पहुंच जाता है, तब व्यवस्था पर सवाल उठते हैं।
सबसे दिलचस्प दृश्य तब होता है जब सत्ता के आसपास घूमने वाले लोग खुद को सरकार समझने लगते हैं। कुछ लोग ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे मुख्यमंत्री ने उन्हें प्रदेश का अनौपचारिक संरक्षक नियुक्त कर दिया हो। वे थाने में भी प्रभाव दिखाते हैं, दफ्तर में भी प्रभाव दिखाते हैं और समाज में भी प्रभाव दिखाते हैं।
आम आदमी की परेशानी यह है कि उसे मुख्यमंत्री दिखाई नहीं देते, मंत्री दिखाई नहीं देते, लेकिन उनके नाम पर रौब झाड़ने वाले लोग हर गली-मोहल्ले में मिल जाते हैं।
यही कारण है कि जनता के बीच अब एक नया व्यंग्य प्रचलित है—"मध्य प्रदेश में रिश्तेदारों की संख्या जनगणना से नहीं, सत्ता परिवर्तन से तय होती है।"
हालांकि सच्चाई यह भी है कि किसी सरकार का मूल्यांकन अफवाहों, चर्चाओं या जातीय पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि उसके कामकाज, पारदर्शिता और जवाबदेही से होना चाहिए। लेकिन जब सत्ता के आसपास भाई-भतीजावाद, संरक्षणवाद और प्रभावशाली लोगों की चर्चा ज्यादा होने लगे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
लोकतंत्र की खूबसूरती यह नहीं कि सत्ता के करीब रहने वाले मजबूत हों। लोकतंत्र की खूबसूरती तब है जब सबसे कमजोर व्यक्ति भी कानून और व्यवस्था पर उतना ही भरोसा कर सके जितना सबसे ताकतवर व्यक्ति करता है।
और शायद मध्य प्रदेश की जनता आज यही पूछ रही है—
"सरकार जनता की है या जनता सिर्फ सरकार बनाने के लिए है?"
"राज चलेगा कानून से या पहचान से?"
"योग्यता जीतेगी या नजदीकियां?"
क्योंकि इतिहास गवाह है कि सत्ता की सबसे बड़ी दुश्मन विपक्ष नहीं होता, बल्कि सत्ता के नाम पर पैदा होने वाला अहंकार होता है।

Post a Comment