प्रणव बजाज
मध्य प्रदेश में इन दिनों एक नया खेल चल रहा है। पहले बच्चे "चोर-सिपाही" खेलते थे, अब बड़े लोग "घोटाला-जांच" खेल रहे हैं।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को कुर्सी पर बैठे अभी ज्यादा समय नहीं हुआ, लेकिन ऐसा लगता है कि वे मुख्यमंत्री कम और घोटालों की फाइलों के स्थायी संरक्षक ज्यादा बन गए हैं। सुबह उठते ही कोई नया खुलासा, दोपहर में जांच की घोषणा और शाम तक जिम्मेदारी तय करने के लिए समिति। प्रदेश का प्रशासन अब सचिवालय से कम और जांच आयोगों के वेटिंग रूम से ज्यादा दिखाई देता है।
जनता पूछ रही है—"मोहन सरकार चल रही है या घोटालों का स्टार्टअप?"
प्रदेश की हालत ऐसी है कि गरीब को योजना का लाभ मिले या न मिले, योजना के नाम पर किसी न किसी का लाभ जरूर हो जाता है। जनता के लिए योजना शुरू होती है, नोकरशाहो के लिए संभावना और ठेकेदारों के लिए अवसर।
कागजों में सड़कें इतनी बन चुकी हैं कि अमेरिका तक पहुंच जाएं, लेकिन गांव का आदमी आज भी बरसात में कीचड़ नाप रहा है। फाइलों में विकास दौड़ रहा है और जमीन पर जनता पैदल चल रही है।
सरकार कहती है—"हम गरीबों के लिए काम कर रहे हैं।"
गरीब कहता है—"साहब, काम तो मेरे नाम पर बहुत हो रहा है, बस मुझे छोड़कर।"
प्रदेश का खजाना ऐसा हो गया है जैसे शादी में रखा मिठाई का डिब्बा—ऊपर से भरा हुआ दिखता है, अंदर हाथ डालो तो खाली निकलता है। हर साल नया कर्ज, हर साल नए वादे और हर साल वही पुराना सवाल—आखिर पैसा गया कहां?
मध्य प्रदेश पर लाखों करोड़ का कर्ज है। हालत यह है कि अगर प्रदेश का हर नवजात बच्चा बोलना सीख जाए तो उसका पहला शब्द शायद "मां" नहीं, "लोन" निकले।
सरकार विकास के नाम पर कर्ज ले रही है। जनता विकास ढूंढ रही है। अफसर फाइल ढूंढ रहे हैं। और विपक्ष जिम्मेदार ढूंढ रहा है। लेकिन जिम्मेदार ऐसा दुर्लभ जीव बन गया है, जो हर जांच में दिखाई देता है, लेकिन पकड़ में कभी नहीं आता।
प्रदेश में जब भी कोई मामला सामने आता है, सरकार का पहला जवाब होता है—"जांच होगी।"
ऐसा लगता है कि मध्य प्रदेश में अब दो ही उद्योग तेजी से बढ़ रहे हैं—एक कर्ज और दूसरा जांच।
गरीब को राशन चाहिए, उसे पोर्टल मिलता है।
युवा को नौकरी चाहिए, उसे परीक्षा मिलती है।
किसान को दाम चाहिए, उसे आश्वासन मिलता है।
और अफसर को क्या मिलता है? यह सवाल पूछना लोकतंत्र के हित में नहीं माना जाता।
जनता को अब लगने लगा है कि सरकार की सबसे सफल योजना "घोषणा योजना" है। इसमें पैसा कम लगता है, ताली ज्यादा बजती है और जवाबदेही लगभग शून्य रहती है।
मोहन सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यह है कि उसने जनता को अर्थशास्त्र समझा दिया है। अब गांव का आदमी भी जानता है कि बजट क्या होता है, घाटा क्या होता है और कर्ज कितना खतरनाक होता है। फर्क सिर्फ इतना है कि उसका कर्ज बैंक वसूल लेता है और सरकार का कर्ज अगली पीढ़ी चुकाती है।
आज प्रदेश में हालत यह है कि विकास के पोस्टर चमक रहे हैं, लेकिन जनता की जेब फीकी पड़ रही है। सरकारी विज्ञापनों में मध्य प्रदेश दौड़ रहा है, मगर आम आदमी महंगाई, बेरोजगारी और व्यवस्था के बोझ तले हांफ रहा है।
और सबसे मजेदार बात यह है कि हर विवाद के बाद सरकार कहती है—"दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।"
जनता कहती है—"ठीक है, लेकिन कभी मिल जाएं तो हमें भी बता देना।"
अंत में बस इतना ही—
मध्य प्रदेश में अब सवाल यह नहीं रह गया कि घोटाला हुआ या नहीं। सवाल यह है कि अगली जांच की प्रेस कॉन्फ्रेंस कब है।
और जनता, जो हर पांच साल में मालिक बनती है, बाकी समय दर्शक दीर्घा में बैठकर यह तमाशा देख रही है कि आखिर मोहन सरकार घोटालों से लड़ रही है या घोटाले मोहन सरकार से तेज दौड़ रहे हैं।

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