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कॉरपोरेट अस्पतालों का मकड़जाल: इलाज या मुनाफे का उद्योग?The web of corporate hospitals: Treatment or profit-making industry?

सम्पादकीय ( प्रणव बजाज )


यह ऐसा जाल है कि यदि कोई परिवार इसमें एक-दो बार फँस गया, तो उसकी पूरी जिंदगी की जमा-पूंजी निकल जाती है। क्योंकि अब कई बड़े अस्पताल केवल इलाज के केंद्र नहीं रह गए हैं, बल्कि एक तरह से बिजनेस सेंटर बन चुके हैं। यहाँ इलाज के साथ-साथ मुनाफे की गणित भी चलती है।



ऐसी शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं कि कई जगहों पर बिना आवश्यकता के ऑपरेशन किए जाते हैं, एक ही तरह की जाँचें दो-दो या तीन-तीन बार करवाई जाती हैं, मामूली बुखार के मरीज को भी आईसीयू तक पहुँचा दिया जाता है। आलोचकों का आरोप है कि इसके पीछे अस्पतालों की कमाई बढ़ाने की प्रवृत्ति काम करती है।


अत्यंत गंभीर मामला


भारत का स्वास्थ्य क्षेत्र कई गंभीर सवालों के घेरे में है और इस पर समय-समय पर संसदीय समितियाँ भी चिंता जता चुकी हैं।

ज़ी न्यूज़ की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 44 प्रतिशत सर्जरी ऐसी पाई गईं जिन्हें विशेषज्ञों ने अनावश्यक या संदिग्ध श्रेणी में रखा। रिपोर्ट में दावा किया गया कि 55 प्रतिशत हृदय सर्जरी, 48 प्रतिशत हिस्टेरेक्टॉमी (गर्भाशय निकालना), 47 प्रतिशत कैंसर सर्जरी, 48 प्रतिशत घुटना प्रत्यारोपण तथा 45 प्रतिशत सी-सेक्शन जैसी प्रक्रियाओं पर सवाल उठे हैं।

महाराष्ट्र एवं मध्य प्रदेश के कई प्रतिष्ठित अस्पतालों में किए गए सर्वेक्षणों में यह भी सामने आया कि वरिष्ठ डॉक्टरों को अत्यधिक वेतन दिया जाता है। आरोप यह भी लगाए जाते रहे हैं कि अधिक जाँच, भर्ती और ऑपरेशन कराने वाले डॉक्टरों को अधिक प्रोत्साहन मिलता है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्टों में ऐसे मामले भी सामने आए, जिनमें मृत मरीजों को लंबे समय तक वेंटिलेटर पर रखकर इलाज जारी रखने के आरोप लगे। एक मामले में 14 वर्षीय लड़के को मृत होने के बावजूद एक महीने तक वेंटिलेटर पर रखने का विवाद सामने आया था। बाद में अस्पताल को मुआवजा देने का आदेश दिया गया।


कई मामलों में यह आरोप भी लगाए गए कि मरीज की वास्तविक स्थिति छिपाकर परिवार से तत्काल ऑपरेशन के नाम पर बड़ी रकम जमा करवाई जाती है और बाद में मृत्यु की सूचना दी जाती है। ऐसे मामलों की समय-समय पर शिकायतें सामने आती रही हैं।

बीमा (मेडिक्लेम) घोटाला भी उतना ही भयावह

भारत में करोड़ों लोगों ने स्वास्थ्य बीमा ले रखा है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर कई बार दावों के अस्वीकार होने या आंशिक भुगतान किए जाने की शिकायतें सामने आती हैं। परिणामस्वरूप भारी आर्थिक बोझ परिवारों पर पड़ता है।


करीब 3,000 प्रतिष्ठित अस्पतालों को विभिन्न कारणों से बीमा कंपनियों द्वारा ब्लैकलिस्ट किए जाने की खबरें भी समय-समय पर सामने आई हैं। कोविड-19 काल में भी फर्जी बिलिंग और बीमा दावों को लेकर कई विवाद सामने आए।

मानव अंग तस्करी का खतरा

2019 में इंडियन एक्सप्रेस ने एक दर्दनाक घटना उजागर की थी। कानपुर की संगीता कश्यप को नौकरी का झाँसा देकर दिल्ली लाया गया। स्वास्थ्य जाँच के बहाने अस्पताल में भर्ती किया गया। संदेह होने पर वह वहाँ से निकल गईं। बाद में शिकायत के आधार पर एक अंतरराष्ट्रीय अंग तस्करी गिरोह का भंडाफोड़ हुआ, जिसमें कई लोग शामिल पाए गए।

अस्पताल रेफरल घोटाला

कई बार मरीजों को गंभीर बीमारी बताकर बड़े अस्पतालों में भेजा जाता है। आरोप लगते रहे हैं कि कुछ अस्पतालों में रेफरल प्रोग्राम के माध्यम से मरीज भेजने वाले डॉक्टरों को आर्थिक लाभ दिया जाता है। इस व्यवस्था पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं।

डायग्नोसिस घोटाला

यह अरबों रुपये का कारोबार माना जाता है।

बेंगलुरु में आयकर विभाग की छापेमारी के दौरान एक प्रतिष्ठित पैथोलॉजी नेटवर्क से भारी मात्रा में नकदी और सोना बरामद होने की खबरें सामने आई थीं। आरोप था कि डॉक्टरों को कमीशन देकर अनावश्यक जाँचें लिखवाई जाती थीं।

भारत में दो लाख से अधिक पैथोलॉजी लैब संचालित होने का अनुमान है, जबकि मान्यता प्राप्त लैब की संख्या अपेक्षाकृत बहुत कम है। यही कारण है कि जाँच रिपोर्टों की गुणवत्ता और पारदर्शिता पर लगातार सवाल उठते रहते हैं।

फार्मा कंपनियों के घोटाले

बड़ी दवा कंपनियों पर लंबे समय से आरोप लगते रहे हैं कि वे अपनी दवाएँ लिखवाने के लिए डॉक्टरों को विभिन्न प्रकार के लाभ देती हैं। कोविड काल में डोलो टैबलेट को लेकर भी ऐसे आरोप चर्चा में रहे थे।


कई रिपोर्टों में दावा किया गया कि डॉक्टरों को नकद राशि, विदेश यात्राएँ, सेमिनार और महंगे होटल में ठहरने जैसी सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं, ताकि वे विशेष कंपनियों की दवाएँ लिखें।

अस्पताल–फार्मा कंपनी गठजोड़

आरोप यह भी हैं कि कई दवाएँ और सर्जिकल उपकरण अस्पतालों को बेहद कम कीमत पर उपलब्ध कराए जाते हैं, लेकिन मरीजों से कई गुना अधिक राशि वसूली जाती है।


इंडिया टुडे की एक जाँच में दावा किया गया था कि कुछ कैंसर दवाओं पर अस्पतालों द्वारा भारी मार्जिन लिया जाता है, जिससे मरीजों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है।


मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI)

2016 में एक सरकारी समिति की रिपोर्ट में कहा गया था कि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया मेडिकल कॉलेजों को अनुमति देने में तो सक्रिय रही, लेकिन डॉक्टरों और अस्पतालों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने में विफल रही।

MCI के प्रमुख नियम

1. डॉक्टर को ब्रांडेड दवा के बजाय जनरिक दवा लिखने को प्राथमिकता देनी चाहिए।

2. उपचार शुरू करने से पहले फीस और खर्च की जानकारी देना आवश्यक है।

3. जाँच और इलाज से पहले मरीज की सहमति अनिवार्य है।

4. प्रत्येक मरीज का रिकॉर्ड कम से कम तीन वर्ष तक सुरक्षित रखा जाना चाहिए।

5. अनैतिक या अयोग्य डॉक्टरों की जानकारी संबंधित संस्थाओं तक पहुँचाना चिकित्सकों का दायित्व है।

सरकारी योजनाओं में भी घोटाले के आरोप

आरोप यह भी लगते रहे हैं कि कुछ मामलों में सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का दुरुपयोग कर फर्जी इलाज और फर्जी बिल बनाए जाते हैं। इसमें अस्पतालों और कुछ भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं।

निष्कर्ष

यह विषय केवल चिकित्सा क्षेत्र का नहीं, बल्कि आम नागरिक के जीवन और उसकी मेहनत की कमाई से जुड़ा हुआ है। इसलिए हर नागरिक को अपने अधिकारों, उपचार प्रक्रिया, अस्पताल के बिल, दवाओं और जाँचों के बारे में जागरूक रहना चाहिए।


स्वास्थ्य सेवा का उद्देश्य मरीज का उपचार होना चाहिए, न कि उसकी मजबूरी को मुनाफे में बदलना।

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