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आशीर्वाद, आरोप और खामोशी... आखिर किसके भरोसे चल रही है सरकार?Blessings, accusations and silence... on whose support is the government running?

 

प्रणव बजाज

मध्यप्रदेश की राजनीति में इन दिनों सबसे बड़ा सवाल किसी नई योजना का नहीं, बल्कि जवाबदेही का है। मुख्यमंत्री मोहन यादव को लेकर उठे विवादों पर सत्ता के गलियारों में जितनी तेजी से बचाव की आवाजें उठीं, उतनी तेजी से सरकार की ओर से स्पष्ट जवाब नहीं आए।


कहा गया कि संघ के वरिष्ठ प्रचारक सुरेश सोनी का पूरा आशीर्वाद मुख्यमंत्री को प्राप्त है। जैसे ही जमीन से जुड़े विवाद की खबर सामने आई, सत्ता पक्ष से यह तर्क आने लगा कि "यह सब तो 2023 के चुनावी घोषणा पत्र में बताया जा चुका था" और "रियल एस्टेट का व्यवसाय तो वर्षों से किया जा रहा है।"

यदि ऐसा है, तो फिर सवाल यह नहीं कि व्यवसाय था या नहीं। सवाल यह है कि क्या सब कुछ नियमों के अनुसार था? यदि था, तो स्वतंत्र जांच से परहेज़ क्यों?

भाजपा के कुछ नेता खुलकर मोहन यादव के समर्थन में सामने आ गए। लेकिन जनता की नजर कहीं और टिकी है। सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दिल्ली में मुलाकात के दौरान आखिर क्या बातचीत हुई? क्या प्रधानमंत्री ने कोई नाराजगी जताई? क्या कोई निर्देश दिया? या फिर सब कुछ सामान्य रहा? इन सवालों का जवाब अभी भी सामने नहीं आया है।

राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि "फलां नेता का आशीर्वाद है, इसलिए कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।" लेकिन लोकतंत्र में सबसे बड़ा आशीर्वाद जनता का होता है, किसी व्यक्ति का नहीं।

जनता यह भी पूछ रही है कि जिन दो मामलों—कथित शराब (दारू) प्रकरण और जमीन से जुड़े विवाद—को लेकर लगातार चर्चाएं होती रहीं, उनमें अब तक आधिकारिक स्थिति क्या है? जांच कहां तक पहुंची? निष्कर्ष क्या निकला? यदि आरोप निराधार हैं तो सरकार दस्तावेजों के साथ स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं करती? और यदि जांच चल रही है तो उसकी प्रगति सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती?

विडंबना देखिए। जब कोई छोटा अधिकारी विवादों में घिरता है तो तत्काल तबादला, निलंबन या जांच की खबर आ जाती है। लेकिन जब मामला सत्ता के शीर्ष तक पहुंचता है तो पहले राजनीतिक बयान, फिर बचाव और उसके बाद लंबी खामोशी दिखाई देती है।

जनता यह भी पूछ रही है कि यदि यही आरोप किसी विपक्षी मुख्यमंत्री पर लगे होते तो क्या भाजपा की प्रतिक्रिया भी इतनी ही संयमित होती? क्या तब भी कहा जाता कि "जांच होने दीजिए", या इस्तीफे की मांग सड़कों से संसद तक गूंज रही होती?

यह व्यंग्य किसी व्यक्ति के दोषी होने का फैसला नहीं करता। दोष तय करना अदालत और जांच एजेंसियों का काम है। लेकिन सवाल पूछना जनता का अधिकार है, और जवाब देना सरकार का दायित्व।

आखिर लोकतंत्र में सरकार किसी एक नेता के आशीर्वाद से नहीं, जनता के विश्वास से चलती है।

इसलिए आज सबसे बड़ा सवाल यही है—

मोहन यादव पर उठे सवालों का जवाब कौन देगा? भाजपा? संघ? मुख्यमंत्री स्वयं? या फिर दिल्ली की खामोशी ही अंतिम जवाब मानी जाए?

जनता इंतजार कर रही है—बयानों का नहीं, तथ्यों का।

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