प्रणव बजाज
उज्जैन आज मध्यप्रदेश के सबसे तेजी से बदलते शहरों में शामिल है। सिंहस्थ-2028, इंदौर-उज्जैन ग्रीनफील्ड कॉरिडोर, नए बायपास, औद्योगिक विस्तार, धार्मिक पर्यटन, मास्टर प्लान-2035 और हजारों करोड़ की परियोजनाएं शहर का भूगोल बदलने जा रही हैं।
लेकिन इन परियोजनाओं के बीच एक सवाल लगातार बड़ा होता जा रहा है—क्या विकास की आहट कुछ लोगों को पहले सुनाई दे गई थी?
The Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के परिवार और उनसे जुड़ी कंपनियों द्वारा वर्ष 2021 से अब तक उज्जैन और आसपास के क्षेत्रों में लगभग 253 एकड़ भूमि खरीदे जाने का दावा किया गया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि मुख्यमंत्री बनने के बाद भूमि खरीद की रफ्तार बढ़ी और लगभग 168 एकड़ जमीन इसी अवधि में खरीदी गई।
रिपोर्ट में मोहन यादव, उनकी पत्नी सीमा यादव, परिवार के अन्य सदस्यों तथा उनसे जुड़ी कंपनियों के नामों का उल्लेख किया गया है। इनमें Shri Siddhivinayak Devcons Pvt. Ltd. जैसी कंपनियां भी चर्चा में हैं।
लेकिन उज्जैन की राजनीतिक और सामाजिक चर्चाओं में सवाल केवल 253 एकड़ का नहीं है।
स्थानीय स्तर पर लंबे समय से यह चर्चा होती रही है 1000 बिधा कि सावराखेड़ी, मक्सी रोड, आगर रोड, इंदौर रोड, चिंतामण बायपास, विक्रम उद्योगपुरी और शहरी विस्तार के अन्य क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर भूमि निवेश वर्षों से होता रहा है। इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जनता के बीच यह जिज्ञासा लगातार बनी हुई है कि आखिर विकास की धुरी बनने वाले क्षेत्रों में निवेश का यह संयोग कैसे बार-बार दिखाई देता है।
सड़कें बाद में आईं, जमीन पहले खरीदी गई?
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद खरीदी गई भूमि में से लगभग 111 एकड़ ऐसे क्षेत्रों में स्थित है जो सड़क परियोजनाओं, हाईवे लिंक या भविष्य के शहरी विस्तार से जुड़े बताए जा रहे हैं।
यहीं सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है।
क्या यह केवल एक सफल व्यावसायिक अनुमान था?
या फिर भविष्य के विकास क्षेत्रों की पहचान कुछ लोगों को पहले से थी?
यदि यह केवल निवेश की समझ थी, तो वही समझ आम निवेशकों और किसानों तक क्यों नहीं पहुंची?
बिल्डरों के नाम क्यों चर्चा में हैं?
उज्जैन में भूमि निवेश को लेकर चल रही चर्चाओं में कुछ प्रमुख रियल एस्टेट कारोबारियों के नाम भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं। स्थानीय चर्चाओं में महेश परियानी, स्व .सुशील गिरिया, मुकेश राका,नितेश यादव अन्नपूर्णा बिल्डर तथा अन्य बिल्डर समूहों का उल्लेख किया जाता है। यह सब मोहन के पार्टनर है । हालांकि इन नामों को लेकर किसी जांच एजेंसी ने कोई निष्कर्ष सार्वजनिक नहीं किया है और न ही इन व्यक्तियों पर कोई सिद्ध आरोप है।लेकिन उज्जैन में उनके बिना पता नहीं हिलता ?
फिर भी जनता पूछ रही है कि क्या बड़े भूमि निवेश, रियल एस्टेट नेटवर्क और भविष्य की सरकारी परियोजनाओं के बीच किसी प्रकार का संबंध है?
यदि नहीं, तो इस पूरे मामले को सार्वजनिक करने में हिचकिचाहट क्यों?
मुख्यमंत्री बनने के बाद क्यों बढ़ी खरीद?
रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2021 से 2023 के बीच लगभग 85 एकड़ भूमि खरीदी गई, जबकि 2024-25 में लगभग 168 एकड़ भूमि की खरीद का दावा किया गया है।
यहीं से बहस और तीखी हो जाती है।
क्या मुख्यमंत्री बनने के बाद उज्जैन के भविष्य पर विश्वास अचानक बढ़ गया?
यदि ऐसा था, तो प्रदेश के अन्य शहरों में इसी स्तर का निवेश क्यों नहीं दिखाई देता?
जनता जानना चाहती है
यह लेख किसी को दोषी घोषित नहीं करता।
यह कोई न्यायिक निर्णय नहीं है।
लेकिन लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं है।
जनता जानना चाहती है—
सभी भूमि खरीद की पूरी सूची सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती?
खरीद की तारीखें और भुगतान स्रोत सार्वजनिक क्यों नहीं किए जाते?
किन क्षेत्रों में बाद में सड़क, बायपास या कॉरिडोर परियोजनाएं आईं?
क्या किसी स्वतंत्र एजेंसी या संसदीय समिति द्वारा पूरे मामले की समीक्षा होनी चाहिए?
क्या मुख्यमंत्री स्वयं इस विषय पर विस्तृत सार्वजनिक स्पष्टीकरण देंगे?
बौद्धिक प्रतिकार की टिप्पणी
"लोकतंत्र में सबसे बड़ा भ्रष्टाचार हमेशा पैसों से शुरू नहीं होता। कई बार वह सूचना से शुरू होता है। जब विकास की दिशा जनता को बाद में और निवेश कुछ लोगों को पहले दिखाई दे, तब सवाल जमीन का नहीं, व्यवस्था की पारदर्शिता का होता है।" उज्जैन की जमीनों पर उठ रहे सवालों का जवाब केवल राजनीतिक बयान नहीं दे सकते। जवाब दस्तावेज, पारदर्शिता और सार्वजनिक जांच ही दे सकती है।

Post a Comment