भोपाल। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की पांच न्यायाधीशों की खंडपीठ ने कैदियों की अस्थायी रिहाई (पैरोल/फरलो) को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल किसी मामले में अपील लंबित होने के आधार पर किसी कैदी की अस्थायी रिहाई को अनिश्चितकाल के लिए नहीं रोका जा सकता।
खंडपीठ ने कहा कि अपीलों के निस्तारण में लगने वाला लंबा समय कैदियों के वैधानिक अधिकारों को प्रभावित करने का आधार नहीं बन सकता। यदि कोई कैदी कानून के तहत अस्थायी रिहाई के लिए पात्र है, तो केवल इस वजह से उसका अधिकार समाप्त नहीं किया जा सकता कि उसकी अपील अभी न्यायालय में लंबित है।
अदालत ने अपने फैसले में यह भी माना कि पैरोल और फरलो जैसी व्यवस्थाओं का उद्देश्य कैदियों को परिवार और समाज से जुड़े रहने का अवसर देना है, जिससे उनके पुनर्वास और सामाजिक पुनर्समायोजन में मदद मिल सके। ऐसे अधिकारों पर अनावश्यक प्रतिबंध न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
इस फैसले को जेल प्रशासन और न्यायिक व्यवस्था से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय उन कैदियों के लिए राहत लेकर आया है जिनकी अपीलें वर्षों से लंबित हैं और जो अस्थायी रिहाई के अधिकार से वंचित हो रहे थे।
हाईकोर्ट के इस फैसले से भविष्य में पैरोल और फरलो से जुड़े मामलों के निपटारे में नई न्यायिक दिशा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। यह निर्णय न्याय, मानवीय दृष्टिकोण और कैदियों के वैधानिक अधिकारों के संतुलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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