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श्रद्धांजलि या सियासत?Tribute or politics?

 


"इमाम हुसैन सत्य और न्याय की प्रेरणा हैं"—PM मोदी के संदेश पर उठे सवाल, क्या चुनाव आते ही बदल जाती है नेताओं की भाषा?

प्रणव बजाज

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुहर्रम के अवसर पर कहा कि "हज़रत इमाम हुसैन का बलिदान सत्य, न्याय और अन्याय के खिलाफ अडिग रहने की प्रेरणा देता है। उनका जीवन मानवता को साहस और त्याग का संदेश देता है।" इतिहास में कर्बला के बलिदान को इन्हीं मूल्यों के कारण सम्मान दिया जाता है।


लेकिन राजनीति में बहस इतिहास से आगे बढ़कर टाइमिंग पर आ टिकती है।

सवाल यह है कि क्या यह केवल श्रद्धांजलि है या इसके पीछे चुनावी संदेश भी छिपा है? आखिर चुनावी मौसम आते ही नेताओं को हर धर्म, हर समुदाय और हर आस्था की अचानक इतनी चिंता क्यों होने लगती है?

भाजपा ने वर्षों तक कांग्रेस पर "तुष्टिकरण" का आरोप लगाकर अपनी राजनीतिक पहचान बनाई। ऐसे में जब भाजपा के शीर्ष नेता सभी धार्मिक समुदायों को संदेश देते हैं, तो समर्थकों का एक वर्ग भी पूछने लगता है—क्या यह समावेशी राजनीति है या बदली हुई चुनावी रणनीति

दूसरी ओर, यह भी उतना ही सच है कि किसी ऐतिहासिक या धार्मिक व्यक्तित्व का सम्मान करना अपने आप में किसी राजनीतिक विचारधारा का विरोधाभास नहीं है। भारत की सांस्कृतिक परंपरा विभिन्न धार्मिक महापुरुषों के प्रति सम्मान की रही है। इसलिए केवल श्रद्धांजलि देना अपने आप में तुष्टिकरण का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

लेकिन जनता का सवाल फिर भी वहीं है—यदि सभी धर्म सत्य, न्याय और मानवता का संदेश देते हैं, तो चुनाव आते ही धर्म सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा क्यों बन जाता है?

लोकतंत्र में नेताओं को हर धर्म का सम्मान करने का अधिकार है, लेकिन जनता को यह पूछने का भी अधिकार है कि क्या यह सम्मान पूरे पांच साल दिखाई देता है या केवल चुनावी कैलेंडर के हिसाब से?

देश अब भाषणों से ज्यादा निरंतरता देखना चाहता है। क्योंकि सिद्धांत वही कहलाते हैं जो परिस्थितियों के साथ न बदलें। यदि बयान और राजनीतिक संदेश चुनाव के हिसाब से बदलते दिखें, तो सवाल उठेंगे ही।

आखिर राजनीति का धर्म क्या है—राष्ट्रहित, वैचारिक प्रतिबद्धता या फिर वोट बैंक की मजबूरी? यही सवाल आज सत्ता से भी है और विपक्ष से भी।

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