ढाई हजार से ज्यादा कोचिंग सेंटर, लेकिन आग से बचाव के इंतजाम नदारद; दो महीने में सिर्फ सात पर कार्रवाई
इंदौर में हजारों छात्र-छात्राएं हर दिन अपने बेहतर भविष्य की उम्मीद लेकर कोचिंग संस्थानों का रुख करते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या इन बच्चों की सुरक्षा की कोई गारंटी है? शहर में ढाई हजार से अधिक छोटी-बड़ी कोचिंग क्लासेस संचालित हो रही हैं, लेकिन इनमें से बड़ी संख्या में अग्नि सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम तक नहीं हैं।
हैरानी की बात यह है कि आग जैसी गंभीर आपदा से निपटने के लिए अधिकांश कोचिंग संस्थानों में न तो पर्याप्त फायर सेफ्टी उपकरण हैं और न ही आपातकालीन निकासी की समुचित व्यवस्था। इसके बावजूद जिम्मेदार विभागों की नींद नहीं टूट रही। निगम की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले दो महीनों में केवल सात कोचिंग संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई की गई।
यह स्थिति तब है जब देश के कई शहरों में कोचिंग संस्थानों में हुए हादसे दर्जनों परिवारों की जिंदगी उजाड़ चुके हैं। हर हादसे के बाद सरकारें सख्ती के दावे करती हैं, जांच समितियां बनती हैं और फिर सब कुछ फाइलों में दफन हो जाता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है? बच्चों का भविष्य संवारने का दावा करने वाले कोचिंग संचालकों के लिए सुरक्षा मानकों का पालन प्राथमिकता क्यों नहीं है? और यदि नियमों का उल्लंघन हो रहा है तो जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय क्यों नहीं की जा रही?
अभिभावकों का कहना है कि वे अपने बच्चों को पढ़ने भेजते हैं, किसी खतरे में डालने नहीं। लेकिन वर्तमान हालात में ऐसा लगता है कि बच्चों की सुरक्षा भगवान भरोसे छोड़ दी गई है। एक ओर सरकार शिक्षा और युवा शक्ति की बात करती है, दूसरी ओर हजारों छात्रों की जान से जुड़े मुद्दों पर आंखें मूंदे बैठी है।
सवाल सिर्फ कोचिंग सेंटरों का नहीं, उन हजारों परिवारों की चिंता का है जिनके सपने इन कक्षाओं में बैठते हैं। यदि आज भी जिम्मेदार नहीं जागे तो कल किसी हादसे के बाद संवेदनाएं व्यक्त करने का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।

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