इंदौर नगर निगम की कानूनी लड़ाई को बड़ी सफलता, हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका
सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णयों पर भरोसा जताते हुए कहा – अनुकंपा नियुक्ति को रोजगार पाने का वैकल्पिक माध्यम नहीं बनाया जा सकता
इंदौर, 23 जून।
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाले निर्णय में स्पष्ट कर दिया है कि अनुकंपा नियुक्ति कोई “वंशानुगत रोजगार” या “अधिकार” नहीं है, बल्कि मृत कर्मचारी के परिवार को अचानक उत्पन्न आर्थिक संकट से उबारने के लिए दी जाने वाली एक सीमित एवं अपवादात्मक रियायत है। यदि परिवार वर्षों तक स्वयं का भरण-पोषण करता रहा है तो बाद में अनुकंपा नियुक्ति की मांग न्यायसंगत नहीं मानी जा सकती।
न्यायमूर्ति संदीप एन. भट्ट की एकलपीठ ने अरविंद चावरे बनाम राज्य शासन एवं अन्य (डब्ल्यूपी क्रमांक 19620/2023) में सुनाए गए 6 पृष्ठीय आदेश में याचिका को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया।
इस मामले में इंदौर नगर निगम की ओर से अधिवक्ता अमेय बजाज ने प्रभावी पैरवी करते हुए न केवल तथ्यात्मक बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के अनेक महत्वपूर्ण निर्णयों के आधार पर यह स्थापित किया कि याचिकाकर्ता का दावा कानूनन टिकाऊ नहीं है। न्यायालय ने अपने आदेश में नगर निगम की ओर से रखे गए प्रमुख तर्कों को स्वीकार किया।
क्या था पूरा मामला?
याचिकाकर्ता अरविंद चावरे के पिता कमल किशोर चावरे का निधन 30 अप्रैल 2015 को हुआ था। इसके बाद याचिकाकर्ता ने 22 जून 2015 को अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन प्रस्तुत किया।
इंदौर नगर निगम द्वारा उक्त आवेदन पर विचार करते हुए 14 जून 2021 को उसे अस्वीकार कर दिया गया। इसके पीछे प्रमुख कारण यह था कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध आपराधिक प्रकरण दर्ज थे तथा उसके पास कोई पुलिस क्लियरेंस अथवा चरित्र प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं था।
इसके बाद भी याचिकाकर्ता ने लगभग दो वर्ष तक कोई प्रभावी कानूनी कार्यवाही नहीं की और वर्ष 2023 में उच्च न्यायालय की शरण ली।
इंदौर नगर निगम ने उठाए ये महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु
नगर निगम की ओर से अधिवक्ता अमेय बजाज ने न्यायालय के समक्ष कई महत्वपूर्ण तथ्य रखे:
1. आठ वर्ष बाद मांगी गई अनुकंपा नियुक्ति का कोई औचित्य नहीं
नगर निगम ने तर्क दिया कि यदि परिवार वास्तव में आर्थिक संकट में होता तो वह तत्काल राहत चाहता। पिता की मृत्यु के लगभग 8 वर्ष बाद रोजगार मांगना स्वयं इस बात का प्रमाण है कि तत्काल आर्थिक संकट समाप्त हो चुका है।
2. याचिकाकर्ता के विरुद्ध दो आपराधिक मामले दर्ज थे
नगर निगम ने बताया कि आवेदन के समय याचिकाकर्ता के विरुद्ध एफआईआर क्रमांक 330/2014 तथा 265/2015 दर्ज थीं। बाद में भले ही उसे बरी किया गया हो, किन्तु आवेदन के विचारण के समय उसकी पृष्ठभूमि निर्विवाद रूप से आपराधिक मामलों से जुड़ी हुई थी।
3. आवेदन के समय कोई पुलिस क्लियरेंस नहीं था
नगर निगम ने यह भी तर्क रखा कि आवेदन के साथ या आवेदन के विचारण के समय याचिकाकर्ता ने कोई पुलिस सत्यापन अथवा चरित्र प्रमाण पत्र प्रस्तुत नहीं किया था। न्यायालय ने भी इस तर्क को स्वीकार किया।
4. मृत कर्मचारी स्वयं नियमित सेवा में नहीं था
नगर निगम ने एक और महत्वपूर्ण तथ्य न्यायालय के समक्ष रखा कि याचिकाकर्ता के पिता स्वयं अपनी माता की मृत्यु के बाद अनुकंपा नियुक्ति पर नियुक्त हुए थे और दो वर्ष की परिवीक्षा अवधि पूरी होने से पहले ही उनका निधन हो गया था। इसलिए राज्य शासन की नीति के अनुसार भी मामला अनुकंपा नियुक्ति के योग्य नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का प्रभाव
नगर निगम की ओर से अधिवक्ता अमेय बजाज ने सर्वोच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण निर्णयों का हवाला दिया।
R.P. Kapur बनाम Union of India
नगर निगम ने तर्क दिया कि प्रत्येक बरी होना सम्मानजनक (Honourable Acquittal) नहीं माना जा सकता। संदेह का लाभ मिलने या तकनीकी आधार पर बरी होने की स्थिति अलग होती है।
State of Madhya Pradesh v. Pervez Khan
इस निर्णय के आधार पर यह तर्क रखा गया कि यदि किसी व्यक्ति के विरुद्ध नैतिक अधमता अथवा गंभीर प्रकृति के अपराधों के आरोप रहे हों तो केवल तकनीकी बरी होने से वह स्वतः सरकारी सेवा हेतु पात्र नहीं हो जाता।
Canara Bank v. Ajithkumar G.K. (2025)
नगर निगम ने हालिया सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य केवल तत्काल आर्थिक संकट का निवारण है, न कि रोजगार उपलब्ध कराना। यदि परिवार वर्षों तक स्वयं को संभाल लेता है तो अनुकंपा नियुक्ति का दावा कमजोर हो जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी स्पष्ट किया है कि यह योजना केवल वास्तविक निर्धनता और तत्काल आवश्यकता वाले मामलों के लिए है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि:
* याचिकाकर्ता पिता की मृत्यु के लगभग 8 वर्ष बाद भी जीवित रहा और अपना जीवनयापन करता रहा।
* आवेदन के विचारण के समय कोई पुलिस क्लियरेंस उपलब्ध नहीं था।
* उस समय उसके विरुद्ध दो आपराधिक प्रकरण दर्ज थे।
* अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य केवल आकस्मिक आर्थिक संकट का समाधान करना है।
* इसे सामान्य भर्ती प्रक्रिया का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।
हाईकोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी
न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि:
अनुकंपा नियुक्ति कोई vested right (निहित अधिकार) नहीं है। इसका उद्देश्य केवल उस परिवार को तत्काल राहत देना है जो कमाने वाले सदस्य की अचानक मृत्यु से आर्थिक संकट में आ गया हो। यदि परिवार लंबे समय तक स्वयं का निर्वाह कर चुका है तो अनुकंपा नियुक्ति का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
नगर निगम के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्णय इंदौर नगर निगम सहित प्रदेश की सभी शासकीय एवं नगरीय निकाय संस्थाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि:
* वर्षों पुराने अनुकंपा नियुक्ति दावों पर स्पष्ट मार्गदर्शन मिला है।
* आपराधिक पृष्ठभूमि एवं चरित्र सत्यापन के महत्व को न्यायिक मान्यता मिली है।
* अनुकंपा नियुक्ति को “रोजगार का वैकल्पिक स्रोत” बनाने की प्रवृत्ति पर रोक लगी है।
* सुप्रीम कोर्ट द्वारा विकसित सिद्धांतों को पुनः पुष्ट किया गया है कि आर्थिक विपन्नता (Indigence) ही अनुकंपा नियुक्ति का मूल आधार है।

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