बिहार में शराबबंदी लागू होने के बाद नशे का स्वरूप तेजी से बदलता नजर आ रहा है। शराब की जगह अब ड्रग्स, नशीली गोलियां, इंजेक्शन और अन्य मादक पदार्थों का इस्तेमाल बढ़ने लगा है, जिसे आम बोलचाल में 'सूखा नशा' कहा जा रहा है। इसके चलते युवा पीढ़ी तेजी से इसकी गिरफ्त में आती दिखाई दे रही है।
हाल के वर्षों में राज्य में मादक पदार्थों की तस्करी और सेवन से जुड़े मामलों में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है। पुलिस और नारकोटिक्स एजेंसियों द्वारा बड़ी मात्रा में ड्रग्स जब्त किए जाने की घटनाएं भी बढ़ी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि नशे के नए विकल्पों की उपलब्धता और युवाओं में बढ़ती लत चिंता का विषय बनती जा रही है।
सामाजिक संगठनों का कहना है कि शराबबंदी का उद्देश्य नशामुक्त समाज बनाना था, लेकिन अब ड्रग्स और सिंथेटिक नशे की बढ़ती प्रवृत्ति नई चुनौती बनकर सामने आई है। स्कूल, कॉलेज और शहरी क्षेत्रों में युवाओं के बीच इसकी पहुंच को लेकर भी चिंता जताई जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कानून लागू करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि जागरूकता अभियान, नशामुक्ति केंद्रों की मजबूती और युवाओं के लिए सकारात्मक अवसर उपलब्ध कराना भी जरूरी है। राज्य में बढ़ते ड्रग्स नेटवर्क पर प्रभावी कार्रवाई और सामाजिक भागीदारी से ही इस चुनौती का मुकाबला किया जा सकता है।

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