प्रणव बजाज
11 महीने बाद घोषित हुई टीम ने खड़े किए कई सवाल, पुराने कार्यकर्ता फिर कतार में और दलबदलू नेताओं को बड़ी जिम्मेदारियां
मध्यप्रदेश भाजपा की नई प्रदेश कार्यसमिति घोषित होते ही संगठन के भीतर वर्षों से दबे सवाल फिर सतह पर आ गए हैं। प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल द्वारा घोषित नई टीम में जहां प्रदेश सरकार के 17 मंत्रियों को जगह दी गई है, वहीं कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए कई नेताओं को भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। इससे भाजपा के पुराने और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष की चर्चा तेज हो गई है।
राजनीतिक दलों में नई नियुक्तियां सामान्य बात होती हैं, लेकिन सवाल तब उठता है जब वर्षों तक बूथ, मंडल और जिला स्तर पर संगठन के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित महसूस करने लगें। नई कार्यसमिति को लेकर भी यही चर्चा सबसे ज्यादा सुनाई दे रही है।
कांग्रेस से भाजपा आए नेताओं की मजबूत मौजूदग
नई कार्यसमिति में कांग्रेस पृष्ठभूमि से आए कई नेताओं को महत्वपूर्ण स्थान मिला है। पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी को स्थायी आमंत्रित सदस्य बनाया गया है। उनके साथ दीपक सक्सेना सहित कई ऐसे चेहरे भी संगठन में प्रभावशाली भूमिका में दिखाई दे रहे हैं जो कभी भाजपा की विचारधारा और नीतियों के कट्टर आलोचक रहे हैं।
ज्योतिरादित्य सिंधिया खेमे से जुड़े नेताओं की उपस्थिति भी कार्यसमिति में स्पष्ट दिखाई देती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा नेतृत्व सामाजिक और चुनावी समीकरणों को ध्यान में रखकर संगठन का विस्तार कर रहा है, लेकिन इससे पुराने कार्यकर्ताओं में असहजता भी बढ़ रही है।
कार्यकर्ताओं का सवाल: मेहनत किसके लिए?
भाजपा की ताकत हमेशा उसके संगठन और कार्यकर्ता आधारित ढांचे को माना गया है। बूथ स्तर से लेकर प्रदेश स्तर तक लाखों कार्यकर्ता वर्षों तक बिना किसी पद या अपेक्षा के पार्टी के लिए काम करते हैं। ऐसे में जब महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां लगातार सत्ता से जुड़े या दूसरी पार्टियों से आए नेताओं को मिलती हैं, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं।
कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा है कि क्या संगठन में अब वैचारिक प्रतिबद्धता से ज्यादा राजनीतिक उपयोगिता को महत्व दिया जा रहा है? क्या भाजपा में वर्षों की निष्ठा की तुलना में चुनावी प्रभाव अधिक महत्वपूर्ण हो गया है?
संगठन या सत्ता का विस्तार?
नई कार्यसमिति में 17 मंत्रियों को शामिल किए जाने से एक और बहस शुरू हुई है। भाजपा लंबे समय तक कांग्रेस पर आरोप लगाती रही कि उसने संगठन और सरकार के बीच की रेखा मिटा दी थी। अब सवाल उठ रहा है कि क्या भाजपा भी उसी दिशा में बढ़ रही है?
जब सरकार के इतने बड़े हिस्से को संगठन में जगह मिलती है, तब संगठन की स्वतंत्रता और उसकी निगरानी भूमिका पर भी प्रश्न खड़े होते हैं। लोकतांत्रिक दलों में संगठन का काम केवल सरकार का समर्थन करना नहीं, बल्कि उसे फीडबैक देना और गलतियों पर सचेत करना भी होता है।
जमीनी कार्यकर्ता बनाम प्रभावशाली चेहरे
भाजपा के भीतर यह बहस नई नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में कई ऐसे नेताओं को महत्वपूर्ण पद मिले हैं जो अपेक्षाकृत नए हैं, जबकि दशकों से संगठन में सक्रिय कार्यकर्ता अब भी अवसर की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
नई कार्यसमिति के बाद यह भावना और मजबूत हुई है कि पार्टी में "ग्राउंड कैडर" और "पॉलिटिकल इंपोर्ट" के बीच एक नई खाई बनती जा रही है। हालांकि पार्टी नेतृत्व इसे संगठन विस्तार और सामाजिक संतुलन का हिस्सा बता सकता है, लेकिन कार्यकर्ताओं की नाराजगी को नजरअंदाज करना भी आसान नहीं होगा।
भाजपा के सामने असली चुनौती
भाजपा के लिए चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखना है। चुनाव जीतना और संगठन को जीवंत बनाए रखना दो अलग-अलग बातें हैं। चुनावी रणनीति से सीटें जीती जा सकती हैं, लेकिन मजबूत संगठन केवल समर्पित कार्यकर्ताओं से ही खड़ा होता है।
यदि कार्यकर्ताओं को यह महसूस होने लगे कि संघर्ष करने वालों से ज्यादा महत्व अवसर देखकर आने वालों को मिल रहा है, तो यह किसी भी दल के लिए दीर्घकालिक चुनौती बन सकता है।
बौद्धिक प्रतिकार की टिप्पणी
"राजनीतिक दल केवल नेताओं से नहीं चलते, उन्हें कार्यकर्ता खड़ा करते हैं। यदि कार्यकर्ता प्रतीक्षा में रहें और पद प्रभावशाली चेहरों को मिलते रहें, तो सवाल केवल नियुक्तियों का नहीं, संगठन की आत्मा का बन जाता है।"
नई कार्यसमिति ने भाजपा को नई ऊर्जा दी है या नए सवाल खड़े किए हैं, इसका जवाब आने वाले समय में मिलेगा। लेकिन इतना तय है कि इस सूची ने संगठन के भीतर चल रही उस बहस को फिर जीवित कर दिया है, जिसमें जमीनी कार्यकर्ता और सत्ता के करीब चेहरे आमने-सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं।

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