सीमा पार से ड्रोन, डार्कनेट और हाईटेक नेटवर्क के जरिए भारत में पहुंच रही नशे की खेप; सुरक्षा एजेंसियों ने बदली रणनीति, बड़े नेटवर्क पर कसा शिकंजा
नई दिल्ली। भारत में मादक पदार्थों की तस्करी का तरीका तेजी से बदल रहा है। पहले जहां तस्कर सीमा पार से सुरंगों, वाहनों और मानव नेटवर्क के जरिए नशे की खेप भेजते थे, वहीं अब ड्रोन, डार्कनेट, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म और क्रिप्टोकरेंसी जैसे आधुनिक तकनीकी साधनों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में ड्रोन के जरिए ड्रग तस्करी की घटनाओं में करीब 100 गुना तक वृद्धि दर्ज की गई है।
सीमा से सटे राज्यों, खासकर पंजाब और जम्मू-कश्मीर में ड्रोन के जरिए हथियार, हेरोइन और अन्य मादक पदार्थ गिराने के कई मामले सामने आए हैं। छोटे आकार के ड्रोन रात के अंधेरे में सीमा पार से उड़ान भरते हैं और तय स्थान पर नशे की खेप गिराकर वापस लौट जाते हैं, जिससे तस्करों तक पहुंचना और उन्हें पकड़ना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
ड्रोन के अलावा तस्कर अब डार्कनेट और एन्क्रिप्टेड ऐप्स के जरिए खरीदारों और सप्लायरों से संपर्क कर रहे हैं। भुगतान के लिए क्रिप्टोकरेंसी का इस्तेमाल होने से लेनदेन का पता लगाना भी कठिन हो गया है। इससे ड्रग नेटवर्क पहले की तुलना में अधिक संगठित और तकनीकी रूप से सक्षम हो गए हैं।
इस चुनौती से निपटने के लिए केंद्र सरकार और सुरक्षा एजेंसियों ने निगरानी व्यवस्था को मजबूत किया है। सीमा पर एंटी-ड्रोन सिस्टम, रडार, सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक निगरानी उपकरणों की तैनाती बढ़ाई गई है। साथ ही नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB), सीमा सुरक्षा बल (BSF), राज्य पुलिस और अन्य केंद्रीय एजेंसियां संयुक्त अभियान चलाकर ड्रग सिंडिकेट पर कार्रवाई कर रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ड्रोन और डिजिटल तकनीक के बढ़ते दुरुपयोग को देखते हुए सुरक्षा एजेंसियों को भी लगातार अपनी तकनीक और रणनीति अपडेट करनी होगी। केवल सीमा पर निगरानी बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि साइबर नेटवर्क, वित्तीय लेनदेन और अंतरराष्ट्रीय ड्रग सिंडिकेट पर भी समान रूप से कड़ी नजर रखनी होगी।
सरकार का कहना है कि ड्रग तस्करी के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' की नीति के तहत बड़े नेटवर्क को जड़ से खत्म करने की दिशा में कार्रवाई लगातार तेज की जा रही है।

Post a Comment