विशेष रिपोर्ट | बौद्धिक प्रतिकार
प्रणव बजाज
देश के सबसे स्वच्छ शहर का तमगा पाने वाला इंदौर अब एक गंभीर प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा है। शहर में हाईटेंशन बिजली लाइनों के सुरक्षा कॉरिडोर में 1031 अवैध निर्माण चिन्हित किए गए हैं, जिनमें सबसे अधिक मामले खजराना और देवगुराड़िया क्षेत्र में सामने आए हैं। सवाल यह है कि यदि इन निर्माणों पर कानूनन रोक थी, तो आखिर ये कॉलोनियां और मकान बने कैसे?
बिजली सुरक्षा नियमों के अनुसार 132 केवी और 220 केवी जैसी हाईटेंशन लाइनों के नीचे या निर्धारित सुरक्षा दूरी के भीतर निर्माण पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसके बावजूद वर्षों तक निर्माण होते रहे। जानकारों का मानना है कि बिना स्थानीय प्रशासन, नगर निगम, राजस्व विभाग और संबंधित एजेंसियों की मिलीभगत के इतने बड़े पैमाने पर अवैध निर्माण संभव नहीं हैं।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अब कार्रवाई की तलवार उन परिवारों पर लटक रही है जिन्होंने जीवनभर की कमाई से घर खरीदे या बनाए। यदि ये निर्माण अवैध थे तो समय रहते इन्हें क्यों नहीं रोका गया? क्या नोटिस सिर्फ कागजों तक सीमित रहे और अवैध कमाई का खेल चलता रहा?
विशेषज्ञों का कहना है कि हाईटेंशन लाइनों के नीचे रहने वाले लोगों पर करंट, आग और बड़े हादसों का स्थायी खतरा बना रहता है। मध्य प्रदेश में ऐसे कई हादसे पहले भी हो चुके हैं, जिनमें लोगों की जान गई और बिजली आपूर्ति भी बाधित हुई।
अब सबसे बड़ा सवाल सिर्फ अवैध निर्माण हटाने का नहीं, बल्कि उन अधिकारियों, कॉलोनाइजरों और भूमाफियाओं की जवाबदेही तय करने का है, जिनकी कथित मिलीभगत से हजारों लोगों की जिंदगी खतरे में पहुंच गई। यदि जिम्मेदारों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह अभियान केवल गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों पर कार्रवाई बनकर रह जाएगा, जबकि असली दोषी फिर बच निकलेंगे।

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