इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निकाह हलाला के नाम पर कथित यौन शोषण से जुड़े मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए 9 आरोपियों को राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि यदि शिकायत में दर्ज तथ्यों से संज्ञेय अपराध बनता है, तो पुलिस को निष्पक्ष जांच करने से नहीं रोका जा सकता।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि किसी आपराधिक मामले में केवल यह तर्क पर्याप्त नहीं है कि मामला किसी व्यक्तिगत कानून (पर्सनल लॉ) या धार्मिक परंपरा से जुड़ा है। यदि प्रथम दृष्टया किसी महिला के साथ अपराध होने के आरोप सामने आते हैं, तो कानून के अनुसार जांच और आवश्यक कानूनी कार्रवाई होना अनिवार्य है।
याचिकाकर्ताओं ने एफआईआर और जांच प्रक्रिया को चुनौती देते हुए राहत की मांग की थी, लेकिन हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि इस स्तर पर मामले के गुण-दोष पर टिप्पणी करना उचित नहीं होगा और जांच एजेंसी को स्वतंत्र रूप से अपना काम करने दिया जाना चाहिए।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला स्पष्ट संदेश देता है कि धार्मिक प्रथा या व्यक्तिगत कानून की आड़ में किसी भी कथित आपराधिक कृत्य को न्यायिक जांच से छूट नहीं दी जा सकती। यदि किसी शिकायत में दंडनीय अपराध के पर्याप्त आधार दिखाई देते हैं, तो पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया अपने निर्धारित कानून के अनुसार आगे बढ़ेगी।

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