स्मार्ट सिटी के दावों पर बारिश का तमाचा! सड़कें जलमग्न, बिजली बेदम, ड्रेनेज फेल... अब जनता मांग रही जवाब, सिर्फ आश्वासन नहीं
प्रणव बजाज
इंदौर... देश का सबसे स्वच्छ शहर। लेकिन जैसे ही मानसून की पहली बड़ी परीक्षा आई, शहर की तस्वीर बदल गई। कई सड़कें तालाब बन गईं, कॉलोनियों में पानी भर गया, बिजली व्यवस्था चरमरा गई और नागरिक घंटों परेशान रहे। सवाल यह नहीं कि बारिश ज्यादा हुई, सवाल यह है कि हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद शहर हर मानसून में क्यों डूब जाता है?
जवाबदेही आखिर किसकी?
क्या केवल नगर निगम?
क्या केवल बिजली विभाग?
या फिर पूरी प्रशासनिक व्यवस्था?
जनता की नजर अब सीधे इन जिम्मेदार पदों पर है—
मुख्यमंत्री मोहन यादव
नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय
इंदौर सांसद शंकर लालवानी
महापौर पुष्यमित्र भार्गव
कलेक्टर शिवम अधिकारll
नगर निगम आयुक्त एवं निगम प्रशासन
मध्य प्रदेश पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के जिम्मेदार अधिकारl
लोक निर्माण विभाग (PWD), जल संसाधन, सीवर, ड्रेनेज तथा संबंधित इंजीनियरिंग शाखाएं
जता का कहना है कि जब हर विभाग दावा करता है कि मानसून पूर्व तैयारियां पूरी थीं, तो फिर शहर पानी में क्यों डूबा?
हाल की घटनाएं भूली नहीं है जनत
इंदौर अभी कुछ महीने पहले भागीरथपुरा दूषित पेयजल त्रासदी से उबरा भी नहीं था। जांच में पेयजल पाइपलाइन में सीवेज मिलने की बात सामने आई। राज्य सरकार ने तत्कालीन नगर निगम आयुक्त और अन्य अधिकारियों पर कार्रवाई की तथा जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया शुरू की थी।
इसके बावजूद नागरिक पूछ रहे हैं—
क्या पूरे शहर की जलापूर्ति व्यवस्था की स्वतंत्र जांच हुई?
क्या पुरानी पाइपलाइनें बदली गईं
क्य ड्रेनेज नेटवर्क की क्षमता बढ़ाई गई?
क्या नाला सफाई का सामाजिक ऑडिट हुआ
बारिश ने फिर खोली व्यवस्था की पोल
बारिश के दौरान अनेक इलाकों में जलभराव और बिजली बाधित होने की शिकायतें सामने आईं। दूसरी ओर प्रशासन का कहना है कि मानसून से पहले जल संरक्षण और संबंधित कार्यों पर बड़े पैमाने पर अभियान चलाया गया।
यही विरोधाभास अब सबसे बड़ा सवाल बन गया है—यदि तैयारी पूरी थी तो फिर नागरिकों को इतनी परेशानी क्यों झेलनी पड़ी?
जनता पूछ रही है...
नाला सफाई पर कितना खर्च हुआ?
किन ठेकेदारों को काम दिया गया?
कितने कार्य समय पर पूरे हुए?
कितने इंजीनियरों ने गुणवत्ता प्रमाणित की?
पहली बारिश में सड़कें और जलनिकासी व्यवस्था क्यों जवाब दे गई?
बिजली व्यवस्था हर मानसून में क्यों चरमरा जाती है?
बौद्धिक प्रतिकार की मांग
जलभराव वाले सभी क्षेत्रों का स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट कराया जाए।
नाला सफाई, सड़क निर्माण और ड्रेनेज पर हुए खर्च का श्वेतपत्र जारी किया जाए।
सभी विभागों की संयुक्त जवाबदेही रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों और ठेकेदारों पर समयबद्ध कार्रवाई की जाए।
प्रत्येक वार्ड के लिए जिम्मेदार अधिकारी का नाम और प्रगति रिपोर्ट सार्वजनिक पोर्टल पर डाली जाए।
अंतिम सवाल
इंदौर को "स्मार्ट" बनाने के दावे बहुत हुए। अब समय है "जवाबदेह" शासन का।
जनता टैक्स देती है, सरकार योजनाएं बनाती है, विभाग दावे करते हैं—लेकिन जब पहली बारिश में शहर डूब जाता है, तब जनता पूछती है: आखिर जिम्मेदारी किसकी है?

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