व्यंग्य : प्रणव बजाज
महाराष्ट्र की राजनीति में इन दिनों विचारधारा कम और "वंशावली परीक्षण" ज्यादा चल रहा है। कोई खुद को असली बताने में जुटा है, तो कोई दूसरे को "टेस्ट ट्यूब बेबी" घोषित कर रहा है। लगता है अब चुनाव आयोग के बाद अगला पड़ाव डीएनए लैब ही होगा, जहां राजनीतिक दलों की पैदाइश का प्रमाण पत्र जारी किया जाएगा।
संजय राउत ने शिंदे गुट को "टेस्ट ट्यूब बेबी" कह दिया। अब राजनीति में यह नया वैज्ञानिक अध्याय खुल गया है। पहले दल टूटते थे, फिर जुड़ते थे, अब पैदा भी होने लगे हैं। जनता सोच रही है कि अगर कोई पार्टी टेस्ट ट्यूब से पैदा हुई है तो बाकी दल कौन-सी नर्सरी से आए हैं?
उधर शिंदे गुट खुद को असली शिवसेना बताने में जुटा है, इधर उद्धव गुट विरासत का असली उत्तराधिकारी होने का दावा कर रहा है। दोनों पक्षों की हालत उस परिवार जैसी है, जहां मकान से ज्यादा झगड़ा नेमप्लेट पर होता है। घर एक, तस्वीर एक, नारे एक, लेकिन दावा दो-दो।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि जनता महंगाई, बेरोजगारी और सड़क के गड्ढों पर जवाब चाहती है, लेकिन नेताओं के पास जवाब विरासत, पहचान और असली-नकली के प्रमाण पत्रों में उलझा हुआ है।
महाराष्ट्र की राजनीति अब विचारों की नहीं, "जन्म प्रमाण पत्र" की लड़ाई बनती जा रही है। जनता बस यह जानना चाहती है कि जो भी असली हो, कम से कम काम भी असली करे।

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