इंदौर नगर निगम को हाईकोर्ट में बड़ी कानूनी सफलता, याचिका खारिज
इंदौर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि अनुकंपा नियुक्ति कोई निहित अधिकार (Vested Right) नहीं है, बल्कि मृत कर्मचारी के परिवार को तत्काल आर्थिक संकट से उबारने के लिए दी जाने वाली एक विशेष राहत है। यदि परिवार वर्षों तक अपना भरण-पोषण करता रहा है तो लंबे समय बाद अनुकंपा नियुक्ति की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।
न्यायमूर्ति संदीप एन. भट्ट की एकलपीठ ने अरविंद चावरे बनाम राज्य शासन एवं अन्य मामले में याचिका खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता अपने पिता की मृत्यु के लगभग आठ वर्ष बाद तक सामान्य जीवनयापन करता रहा, जिससे यह स्पष्ट होता है कि तत्काल आर्थिक संकट की स्थिति नहीं थी।
मामले में इंदौर नगर निगम की ओर से अधिवक्ता अमेय बजाज ने पक्ष रखते हुए तर्क दिया कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि आकस्मिक आर्थिक संकट में सहायता देना है। नगर निगम ने यह भी बताया कि आवेदन के विचारण के समय याचिकाकर्ता के विरुद्ध आपराधिक प्रकरण दर्ज थे तथा उसने पुलिस सत्यापन या चरित्र प्रमाण पत्र भी प्रस्तुत नहीं किया था।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि अनुकंपा नियुक्ति को सामान्य भर्ती प्रक्रिया का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए माना कि ऐसी नियुक्ति केवल वास्तविक आर्थिक विपन्नता और तत्काल आवश्यकता की स्थिति में ही दी जा सकती है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला प्रदेश की शासकीय एवं नगरीय निकाय संस्थाओं के लिए महत्वपूर्ण नजीर साबित होगा।

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