उच्च शिक्षा के लिए भारतीय छात्रों की पहली पसंद रहे अमेरिका की चमक अब कुछ फीकी पड़ती दिखाई दे रही है। बीते एक वर्ष में करीब 30 हजार भारतीय छात्रों ने अमेरिका छोड़ दिया है। इसके पीछे बढ़ती ट्यूशन फीस, महंगा रहन-सहन, सख्त वीजा नियम और पढ़ाई पूरी होने के बाद नौकरी मिलने को लेकर बढ़ती अनिश्चितता को प्रमुख कारण माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका में शिक्षा और जीवन-यापन की लागत लगातार बढ़ रही है। वहीं वीजा प्रक्रिया, इमिग्रेशन नीतियों और रोजगार संबंधी नियमों में सख्ती ने भी छात्रों की चिंता बढ़ा दी है। इससे कई छात्र वैकल्पिक देशों की ओर रुख कर रहे हैं।
अब जर्मनी, फ्रांस और नीदरलैंड्स जैसे यूरोपीय देश भारतीय छात्रों के लिए आकर्षक विकल्प बनकर उभरे हैं। इन देशों में अपेक्षाकृत कम शिक्षा शुल्क, गुणवत्तापूर्ण विश्वविद्यालय, शोध के बेहतर अवसर और पढ़ाई के बाद रोजगार के अनुकूल नीतियां छात्रों को अपनी ओर खींच रही हैं।
शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय छात्र अब केवल प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के बजाय कुल खर्च, वीजा नीति, रोजगार के अवसर और स्थायी करियर जैसे पहलुओं को भी प्राथमिकता दे रहे हैं। यही वजह है कि विदेश में उच्च शिक्षा के लिए छात्रों की पसंद में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है।
हालांकि, अमेरिका अभी भी दुनिया के शीर्ष शिक्षण संस्थानों और शोध सुविधाओं के कारण एक महत्वपूर्ण गंतव्य बना हुआ है, लेकिन बदलते वैश्विक परिदृश्य में छात्रों के सामने अब पहले से कहीं अधिक विकल्प उपलब्ध हैं।

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