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"रास्ता खुला, पर खतरा कायम — क्या सच में टला संकट?"The Path Is Open, But the Danger Persists — Has the Crisis Truly Passed?

सम्पादकीय



अमेरिका-इस्राइल व ईरान के बीच जारी संघर्ष में किसी पक्ष के झुकने के लिए तैयार न होने से पश्चिम एशिया में स्थितियां भले ही जटिल बनी हुई हैं, लेकिन इस दरमियान ईरानी विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने भारत, चीन और रूस जैसे कुछ मित्र राष्ट्रों के व्यावसायिक जहाजों को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति देने की घोषणा कर, इन राष्ट्रों को राहत जरूर दे दी है।


उल्लेखनीय है कि फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित इस संकरे समुद्री परिवहन मार्ग के अवरुद्ध होने के बाद से ही वैश्विक तेल और गैस की कीमतों में भारी उछाल आया हुआ है। इस मार्ग से वैश्विक तेल और प्राकृतिक गैस का करीब 20 फीसदी हिस्सा तो गुजरता ही है, भारत को होने वाली कुल ईंधन आपूर्ति का 40 फीसदी से अधिक आयात यहीं से होता है।


भारत के लिए यह इसलिए भी अधिक अहम है, क्योंकि दुनिया में कच्चे तेल के तीसरे सबसे बड़े आयातक होने के साथ हम दुनिया में आयातित ऊर्जा पर सर्वाधिक निर्भर अर्थव्यवस्थाओं में से भी एक हैं। यह देखते हुए कि ईरानी विदेश मंत्री ने अपने दुश्मन देशों से जुड़े जहाजों को इस रणनीतिक जलमार्ग से गुजरने की अनुमति नहीं दी है, भारत सहित चुनिंदा देशों के लिए ईरान का यह निर्णय एक हद तक कूटनीतिक उपलब्धि के तौर पर भी देखा जा सकता है।


जाहिर है, भारत के संदर्भ में इसका श्रेय उन राजनयिक प्रयासों को जाना चाहिए, जो पिछले कुछ हफ्तों में सरकार की तरफ से पश्चिम एशिया में संघर्ष के शीघ्र खात्मे और होर्मुज के जरिये ऊर्जा के निर्बाध प्रवाह को सुनिश्चित करने को लेकर किए गए हैं। पश्चिम एशिया में संघर्ष विराम की संभावना पैदा होने के बाद तेल की कीमतों में कुछ गिरावट जरूर दिखी है, लेकिन अगर युद्धरत पक्षों में युद्ध खत्म करने की शर्तों पर सहमति नहीं बनी तथा यह युद्ध और लंबा खिंचा, तो भारत के पहले से बढ़ रहे आयात बिल पर बोझ और बढ़ जाएगा, जिसका असर आम इन्सान के बजट पर भी पड़ेगा।

लिहाजा, ईरानी विदेश मंत्री की घोषणा तात्कालिक तौर पर फायदेमंद हो सकती है, पर स्थायी शांति और ऊर्जा आपूर्ति को स्थिर बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रयासों की जरूरत है। इस जटिल स्थिति में भारत की सक्रिय कूटनीति ने जो संतुलन बनाए रखा है, वह हमारी आर्थिक सुरक्षा व क्षेत्रीय स्थिरता के लिए अहम है। पर जब तक सभी पक्ष संयम बरतते हुए संवाद का रास्ता नहीं अपनाएंगे, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संकट मंडराते रहेंगे।

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