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भोपाल | विशेष जांच रिपोर्ट
मध्य प्रदेश के पोषण आहार और आजीविका मिशन में कथित गड़बड़ियों को लेकर अब मामला खुलकर सत्ता और नौकरशाही के टकराव में बदलता दिख रहा है। पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद पटेल की नोटशीट ने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
* सबसे बड़ा नाम: पूर्व मुख्य सचिव पर सवाल*
इस पूरे विवाद के केंद्र में हैं
इकबाल सिंह बैंस
आरोप/सवाल (नोटशीट के आधार पर उठे मुद्दे):
उनके कार्यकाल में मिशन से जुड़े निर्णयों पर पारदर्शिता की कमी
जांच प्रक्रिया को कमजोर करने के संकेत
जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं होना
हालांकि, इनके खिलाफ कोई अंतिम दोष सिद्ध नहीं हुआ है — जांच की मांग उठी है। .
आजीविका मिशन के अधिकारी घेरे में
मंत्री की नोटशीट के बाद जिन पदों/भूमिकाओं पर सबसे ज्यादा सवाल उठे:
राज्य आजीविका मिशन के तत्कालीन CEO/वरिष्ठ अधिकारी
पोषण आहार सप्लाई से जुड़े प्रोजेक्ट डायरेक्टर स्तर के अधिकारी
जिला स्तर पर कार्यक्रम लागू करने वाले अफसर
इनके नाम आधिकारिक जांच/रिपोर्ट में सार्वजनिक नहीं किए गए हैं, लेकिन फाइल मूवमेंट और भुगतान अनुमोदन में इनकी भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं।
क्या सिर्फ अफसर या राजनीतिक संरक्षण भी?
यहां मामला और ज्यादा गंभीर हो जाता है क्योंकि सवाल उठ रहे हैं कि:
+ क्या सिर्फ अफसर ही जिम्मेदार हैं?*
या उन्हें राजनीतिक स्तर पर भी संरक्षण मिला?
संभावित राजनीतिक स्तर (सवालों के दायरे में)
ग्रामीण विकास विभाग से जुड़े वर्तमान और पूर्व मंत्री
महिला एवं बाल विकास विभाग (पोषण आहार से जुड़ा)
वित्तीय मंजूरी देने वाले विभागीय स्तर के निर्णयकर्ता
अभी तक किसी भी मंत्री का नाम आधिकारिक रूप से दोषी के रूप में सामने नहीं आया है, लेकिन नोटशीट के बाद राजनीतिक जिम्मेदारी पर बहस तेज हो गई है।
* मंत्री vs सिस्टम: खुली जंग?*
प्रहलाद पटेल की नोटशीट से साफ है कि:
मंत्री खुद अपनी सरकार के अधिकारियों से असंतुष्ट हैं
फाइलों को दबाने और जांच को प्रभावित करने की आशंका जताई गई
“जिम्मेदारी तय करने” की मांग सीधे शीर्ष स्तर तक पहुंचाई गई
जनता के पैसे पर शक
पोषण आहार और आजीविका मिशन में करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। ऐसे में सवाल:
क्या सप्लाई में फर्जीवाड़ा हुआ?
क्या भुगतान नियमों के खिलाफ हुए?
क्या लाभार्थियों तक पूरा फायदा नहीं पहुंचा?
बड़ा सवाल
क्या इकबाल सिंह बैंस को बचाने के लिए सिस्टम एक्टिव हुआ?
कौन-कौन अफसर फाइल दबाने में शामिल थे?
क्या राजनीतिक स्तर पर भी “प्रोटेक्शन” मिला?
आगे क्या हो सकता है?
उच्च स्तरीय जांच या SIT की मांग ,फाइलों की फिर से समीक्षा ,संबंधित अधिकारियों की भूमिका तय कर दी है।
“नोटशीट ने नाम नहीं, लेकिन पूरे सिस्टम को बेनकाब कर दिया — अब सवाल ये नहीं कि घोटाला हुआ या नहीं, सवाल ये है कि किसे बचाया जा रहा है?”

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