फाइलों में कैद हुई जांच समिति
एक तरफ जहां विभागीय मंत्री सख्त कार्रवाई के मूड में हैं। वहीं विभाग के ही कुछ रसूखदार अफसर इस जांच की टाह में रोड़ा अटकाने की कोशिश कर रहे हैं।
विधानसभा से शुरू हुई घेराबंदी
इस बड़े घोटाले की गूंज सबसे पहले 26 फरवरी को विधानसभा में सुनाई दी थी, जब कांग्रेस ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरा। मामला गंभीर होते देख विभागीय मंत्री उदय प्रताप सिंह ने मोर्चा संभाला।
उन्होंने स्कूल शिक्षा सचिव डॉ. संजय गोयल को एक नोटशीट भेजी। मंत्री ने स्पष्ट निर्देश दिए कि लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) के दो रसूखदार अफसरों को तत्काल उनके पदों से हटाकर अन्यत्र भेजा जाए।
इन अफसरों में डायरेक्टर डीएस कुशवाह और उप संचालक पीके सिंह का नाम था। साथ ही, प्रदेश के सभी 55 जिलों के कलेक्टर्स को पत्र लिखकर पिछले तीन साल के निर्माण कार्यों की बारीकी से जांच कटाने के आदेश दिए गए थे।
फाइलों में कैद हुई जांच समिति
मंत्री के निर्देश थे कि माध्यमिक शिक्षा मंडल (MP Board) के सचिव बुद्धेश वैध की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय जांच कमेटी बनाई जाए। इसमें वित्त विभाग का एक एक्सपर्ट अफसर भी शामिल हो।
वहीं, हैरानी की बात यह है कि अब तक न तो कमेटी का गठन हुआ और न ही माशिमं को इस संबंध में कोई आधिकारिक सूचना मिली है। सूत्रों की मानें तो विभाग के भीतर ही इस घोटाले की फाइलों को दबाने की कोशिश हो रही है। स्कूल शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह ने इस सुस्ती पर कड़ी नाराजगी जाहिर करते हुए साफ कर दिया है कि दोषियों पर हर हाल में कार्रवाई होगी।
भोपाल की फर्म और दूरस्थ जिलों का खेल
यह पूरा खेल केंद्र सरकार द्वारा सरकारी स्कूलों की सूरत बदलने के लिए जारी किए गए 149 करोड़ रूपए के इर्द-गिर्द घूम रहा है। आरोप है कि नियमों को ताक पर रखकर रीवा और मेहर जैसे दूर-दराज के जिलों में काम करने का ठेका भोपाल की एक चहेती फर्म को दे दिया गया।
इस पूरे भुगतान प्रक्रिया की निगरानी वित्त अधिकारी राजेश मौर्य के जिम्मे थी। आरोप है कि अफसरों और ठेकेदारों की जुगलबंदी ने धरातल पर ईंट भी नहीं लगने दी और कागजों पर करोड़ों के बिल पास कर दिए गए।
बिना काम किए डकार लिए लाखों रुपए
घोटाले की पहली पुख्ता कमान मैहर के जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) के पत्र से हाथ लगी। उन्होंने विभाग को आगाह किया कि जो काम स्वीकृत हुए थे, वे जमीन पर नजर ही नहीं आ रहे। इसके बाद 8 जनवरी 2026 को जब प्राथमिक जांच रिपोर्ट सामने आई, तो अफसरों के होश उड़ गए।
रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि वाणी इंफ्रास्ट्रक्चर नामक फर्म को बिना कोई काम किए ही 23 लाख 81 हजार रुपए का भुगतान कर दिया गया। यह तो सिर्फ एक जिले की बानगी है; पूरे प्रदेश का आंकड़ा चौंकाने वाला हो सकता है।
बिना काम किए डकार लिए लाखों रुपए
घोटाले की पहली पुख्ता कमान मैहर के जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) के पत्र से हाथ लगी। उन्होंने विभाग को आगाह किया कि जो काम स्वीकृत हुए थे, वे जमीन पर नजर ही नहीं आ रहे। इसके बाद 8 जनवरी 2026 को जब प्राथमिक जांच रिपोर्ट सामने आई, तो अफसरों के होश उड़ गए।
रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि वाणी इंफ्रास्ट्रक्चर नामक फर्म को बिना कोई काम किए ही 23 लाख 81 हजार रूपए का भुगतान कर दिया गया। यह तो सिर्फ एक जिले की बानगी है; पूरे प्रदेश का आंकड़ा चौंकाने वाला हो सकता है।
रडार पर आए ये जिम्मेदार अफसर
जांच की आंच अब विभाग के उन चेहरों तक पहुंच गई है जिनकी कलम से यह भुगतान हुए:
1. डीएस कुशवाह (डायरेक्टर): इन्हीं की स्वीकृति (Approval) से भवनों के मेंटेनेंस का साटा खेल हुआ।
2. पीके सिंह (उप संचालक): इनके पास भवन निर्माण का जिम्मा था। बीच में इनसे प्रभार लिया गया, लेकिन फिर वापस दे दिया गया।
3. राजेश मौर्य (वित्त अधिकारी): टेंडर (Tender) और भुगतान (Payment) की पूरी प्रक्रिया इन्हीं की निगरानी में पूरी हुई।

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