नई दिल्ली। भारत में किसी राज्य का विभाजन या नया राज्य बनना सीधे जनमत संग्रह पर निर्भर नहीं है। तेलंगाना का गठन इसी संवैधानिक व्यवस्था का उदाहरण है। 2 जून 2014 को आंध्र प्रदेश के पुनर्गठन के बाद तेलंगाना भारत का 29वां राज्य बना। इसके लिए संसद ने Andhra Pradesh Reorganisation Act, 2014 पारित किया। अधिनियम में तेलंगाना और शेष आंध्र प्रदेश के लिए अलग-अलग विधानसभा और लोकसभा सीटों की व्यवस्था भी की गई।
इस पूरी व्यवस्था की बुनियाद संविधान के अनुच्छेद 3 में है। इसमें संसद को किसी मौजूदा राज्य के क्षेत्र से अलग करके नया राज्य बनाने, किसी राज्य का क्षेत्र घटाने-बढ़ाने और उसकी सीमाएं या नाम बदलने की शक्ति दी गई है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि संबंधित राज्य की विधानसभा की सहमति जरूरी नहीं होती। राष्ट्रपति प्रस्तावित विधेयक को संबंधित राज्य की विधानसभा के पास उसकी राय जानने के लिए भेजते हैं। विधानसभा अपनी राय देती है, लेकिन संविधान संसद को उस राय से बाध्य नहीं करता। संविधान सभा की बहस में डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने भी स्पष्ट किया था कि राज्यों के पुनर्गठन के मामले में consultation यानी परामर्श जरूरी है, लेकिन consent यानी सहमति जरूरी नहीं।
यही अंतर तेलंगाना के मामले को समझने की कुंजी है। जनमत संग्रह का प्रावधान भी अनुच्छेद 3 में नहीं है। यानी जनता की अलग से सीधी वोटिंग कराना संवैधानिक अनिवार्यता नहीं थी।
और यहां संविधान का शुरुआती वाक्य भी महत्वपूर्ण है—“India, that is Bharat, shall be a Union of States.” संविधान में भारत को राज्यों का Union कहा गया है और संसद को राज्यों की सीमाओं तथा संरचना में कानून के जरिए बदलाव करने की शक्ति दी गई है।
इसलिए तेलंगाना का निर्माण किसी संवैधानिक अपवाद से नहीं, बल्कि अनुच्छेद 3 में दी गई संसद की पुनर्गठन शक्ति का इस्तेमाल करके हुआ था।

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