Top News

काली टी-शर्ट में राहुल, लेकिन सवाल सफेद क्यों रह गए?

इंदौर की भीड़ ने आवाज दी, राहुल गांधी उसे राजनीतिक धार देने से चूक गए

प्रणव बजाज

कपड़ा काला था, मौसम राजनीतिक था और मैदान युवाओं से भरा था। फिर भी इंदौर में राहुल गांधी की ‘छात्रों की गूंज’ कुछ ऐसी रही जैसे ढोल तो पूरा बजा हो, लेकिन आखिरी चोट पड़ते-पड़ते हाथ थक गया हो।



कांग्रेस ने कार्यक्रम में बड़ी संख्या में युवाओं की मौजूदगी का दावा किया। भीड़ ने यह जरूर बता दिया कि बेरोजगारी, शिक्षा और भविष्य को लेकर युवाओं के सवाल जिंदा हैं। लेकिन सवाल यह है कि जिस मंच पर दो लाख युवाओं का आक्रोश बताया जा रहा था, वहां सत्ता से पूछे जाने वाले सबसे तीखे सवाल इतने धीमे क्यों पड़ गए?


राहुल के पास मध्यप्रदेश था—बेरोजगारी थी, प्रतियोगी परीक्षाओं की चिंता थी, सरकारी नौकरियों का सवाल था, हाल के शराब विवाद जैसे संवेदनशील मुद्दे थे। केंद्र की नीतियों पर बोलने के लिए टैरिफ से लेकर डिजिटल अर्थव्यवस्था तक मुद्दों की लंबी सूची थी। मगर इंदौर की सभा में इन सवालों को वह राजनीतिक विस्फोट नहीं मिला, जिसकी उम्मीद थी।


सबसे ज्यादा चर्चा किसकी हुई? भाषण की या मंच पर हुई प्रधानमंत्री की मिमिक्री की? यही तो विडंबना है। जिस सभा में युवाओं का भविष्य मुख्य किरदार होना चाहिए था, वहां एक मिमिक्री साइड-हीरो बनकर पूरी बहस ले गई।


उधर भाजपा भी चुप नहीं बैठी। नियुक्ति पत्रों से लेकर संगठनात्मक कार्यक्रमों तक जवाबी राजनीतिक संदेश दिए गए। यानी एक तरफ युवाओं को लेकर राहुल गांधी की यात्रा और दूसरी तरफ सत्ता-संगठन का अपना नैरेटिव—मुकाबला साफ है।


लेकिन राहुल के सामने असली चुनौती भाजपा से ज्यादा अपनी है।


भीड़ जुटाना पहला अध्याय है, उस भीड़ के सवालों को राजनीतिक एजेंडा बनाना दूसरा।


काली टी-शर्ट को प्रतीक बनाया जा सकता है, लेकिन प्रतीक अपने आप राजनीति नहीं करते। राजनीति तब होती है जब बेरोजगार युवा पूछे—नौकरी कब? छात्र पूछे—फीस और परीक्षा व्यवस्था कैसी होगी? प्रतियोगी परीक्षार्थी पूछे—भर्ती कब होगी? और नेता इन सवालों का सिर्फ विरोध नहीं, विकल्प भी सामने रखे।


इंदौर ने राहुल गांधी को भीड़ दी। अब राहुल गांधी को इंदौर को जवाब देना होगा—अगली सरकार की कल्पना में युवा कहां खड़ा है?


क्योंकि राजनीति का रंग टी-शर्ट से नहीं बदलता।


रंग तब बदलता है, जब जनता के सवाल सत्ता के एजेंडे से बड़े हो जाएं।


और इंदौर की काली टी-शर्ट से निकला सबसे बड़ा सवाल यही है—

क्या ‘छात्रों की गूंज’ सिर्फ सत्ता के खिलाफ आवाज रहेगी, या कभी सत्ता के विकल्प की आवाज भी बनेगी?

Post a Comment

Previous Post Next Post