प्रणव बजाज
देश में चुनाव आते ही विकास की सड़कें भाषणों में दौड़ने लगती हैं। मंच पर प्रधानमंत्री हों, केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री हों या अलग-अलग राज्यों के मुख्यमंत्री—हर कोई शानदार सड़कों और विकास के दावे करता है। लेकिन बरसात की पहली तेज़ बारिश कई जगह उन दावों की परतें भी बहा ले जाती है।
देश में हर साल लाखों सड़क दुर्घटनाएँ होती हैं और बड़ी संख्या में लोगों की जान चली जाती है। सवाल यह है कि सड़कें बनने के कुछ ही समय बाद टूट क्यों जाती हैं? जनता के टैक्स का पैसा आखिर किस गुणवत्ता की सड़कों पर खर्च हो रहा है? हर हादसे के बाद जिम्मेदारी तय करने में इतनी खामोशी क्यों दिखाई देती है?
हर सरकार पिछली सरकार को दोष देती है। हर मुख्यमंत्री केंद्र पर उंगली उठाता है, और केंद्र राज्यों पर। लेकिन गड्ढे किसी पार्टी का झंडा देखकर वाहन नहीं पलटते। वे भाजपा, कांग्रेस, क्षेत्रीय दल या निर्दलीय—किसी में भेदभाव नहीं करते। उनकी राजनीति सिर्फ़ एक है—जनता की जान जोखिम में डालना।
सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि सड़क किसने बनाई। सबसे बड़ा सवाल यह है कि खराब सड़क के कारण यदि किसी परिवार का कमाने वाला सदस्य मर जाए, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या कभी किसी अधिकारी, ठेकेदार या जिम्मेदार विभाग से उसी कठोरता से जवाब मांगा गया, जैसी आम नागरिक से नियम तोड़ने पर मांगी जाती है?
देश को भाषणों से नहीं, टिकाऊ सड़कों से विकास चाहिए। उद्घाटन की चमक से नहीं, निर्माण की ईमानदारी से विश्वास बनता है। जनता अब फीता कटते नहीं, सड़क टिकते देखना चाहती है।
आख़िर में एक सवाल—
जब सड़कें बार-बार टूटती हैं, हादसे बार-बार होते हैं और वादे बार-बार दोहराए जाते हैं, तो बदलता आखिर क्या है—सिर्फ़ सरकार, या जनता की किस्मत?

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