प्रणव बजाज
भारतीय राजनीति में कुछ नेता अपने काम से याद किए जाते हैं, कुछ अपनी दूरदर्शिता से और कुछ अपने बयानों से। राहुल गांधी का राजनीतिक सफर अक्सर तीसरी श्रेणी में दिखाई देता है। मंच से आरोप, प्रेस कॉन्फ्रेंस में हमला और फिर अदालत में सफाई—मानो राजनीति नहीं, बल्कि एक तयशुदा पटकथा चल रही हो।
कभी "चौकीदार चोर है" का नारा, कभी किसी समाज पर टिप्पणी, कभी किसी व्यक्ति पर आरोप और फिर अदालत में यह कहना कि आशय वह नहीं था। सवाल यह नहीं कि माफी मांगना गलत है। गलती स्वीकार करना लोकतांत्रिक मर्यादा का हिस्सा है। लेकिन जब माफी बार-बार राजनीतिक शैली का स्थायी अध्याय बन जाए, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर आरोप पहले और प्रमाण बाद में क्यों आते हैं?
हालिया मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में कार्तिकेय सिंह चौहान से जुड़े प्रकरण में खेद व्यक्त करने के बाद एक बार फिर वही बहस छिड़ गई है। क्या राजनीति अब तथ्यों से कम और सुर्खियां बटोरने से ज्यादा संचालित हो रही है? यदि हर बड़े आरोप का अंत अदालत में सफाई या माफी पर होना है, तो राजनीतिक विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
देश की सबसे पुरानी पार्टी का नेतृत्व करने वाले नेता से अपेक्षा केवल सरकार की आलोचना करने की नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद विकल्प प्रस्तुत करने की भी होती है। संसद से लेकर सड़क तक हर शब्द की जिम्मेदारी होती है। लोकतंत्र में विपक्ष जितना मजबूत होगा, सत्ता उतनी ही जवाबदेह होगी। लेकिन विपक्ष की ताकत केवल आरोपों से नहीं, बल्कि तथ्य, तर्क, नीति और विश्वसनीय नेतृत्व से बनती है।
आज सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यह भी है कि क्या राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस लगातार कमजोर होती गई और उसके साथ पूरा विपक्ष भी बिखरता चला गया? विपक्षी दलों में न पहले जैसी एकजुटता दिखाई देती है, न वैसी आक्रामकता और न ही स्पष्ट नेतृत्व। ऐसा प्रतीत होता है कि विपक्ष के पास न कोई सर्वमान्य चेहरा बचा है, न कोई साझा रणनीति। परिणाम यह है कि कई बार सत्ता पक्ष से ज्यादा विपक्ष की निष्क्रियता चर्चा का विषय बन जाती है।
कांग्रेस का देश की आजादी से जुड़ा गौरवशाली इतिहास रहा है। लेकिन इतिहास केवल विरासत देता है, भविष्य नहीं। भविष्य वर्तमान के नेतृत्व, संगठन और राजनीतिक विश्वसनीयता से तय होता है। यदि संगठन लगातार चुनाव हारता रहे, राज्यों में जनाधार सिकुड़ता जाए और नेतृत्व का बड़ा समय विवादों तथा अदालती मामलों में बीतने लगे, तो कार्यकर्ताओं का मनोबल भी प्रभावित होता है।
राजनीति में लोकप्रियता भाषणों से मिल सकती है, लेकिन विश्वास जिम्मेदार शब्दों, प्रमाणित तथ्यों और लगातार जनसंपर्क से बनता है। अदालतें न्याय देने के लिए हैं, राजनीतिक बयानों का नियमित पड़ाव बनने के लिए नहीं। यदि हर बड़े बयान का अंतिम स्टेशन माफी ही हो, तो जनता यह सवाल पूछने का अधिकार रखती है कि आखिर राजनीति सुर्खियों के लिए हो रही है या समाधान के लिए?
विपक्ष लोकतंत्र की सबसे मजबूत संस्था माना जाता है। यदि वही नेतृत्व संकट, अविश्वास और लगातार विवादों में उलझ जाए, तो नुकसान केवल किसी एक दल का नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक विमर्श का होता है। इसलिए सवाल केवल राहुल गांधी का नहीं, बल्कि उस विपक्ष का भी है जो आज अपने सबसे कठिन दौर से गुजरता दिखाई देता है।

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