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हिसाब दो, मंत्री जी! जनता अब मौन नहीं रहेगी

 


प्रणव बजाज

लोकतंत्र में सत्ता अधिकार नहीं, लोकविश्वास की धरोहर होती है। जो व्यक्ति जनता के मत से मंत्री बनता है, वह केवल विभाग का स्वामी नहीं, बल्कि जनता के धन और विश्वास का संरक्षक भी होता है। इसलिए उसके लिए यह बताना कोई उपकार नहीं, बल्कि संवैधानिक और नैतिक दायित्व है कि उसकी संपत्ति कितनी है और उसमें हर वर्ष कितना इज़ाफ़ा हुआ।


मध्य प्रदेश में एक समय स्वर्गीय सुंदरलाल पटवा ने ऐसी परंपरा स्थापित की थी, जिसमें मंत्रियों से प्रतिवर्ष अपनी आय और संपत्ति का विवरण देने की अपेक्षा की जाती थी। आज वही परंपरा इतिहास के पन्नों में सिमट गई है। प्रश्न यह है कि यदि परंपरा जनहित में थी, तो उसे समाप्त किसने और क्यों होने दिया?

चुनाव के समय प्रत्येक मंत्री और विधायक अपनी संपत्ति का शपथपत्र निर्वाचन आयोग के समक्ष प्रस्तुत करता है। फिर कार्यकाल के दौरान प्रतिवर्ष वही विवरण सार्वजनिक करने में संकोच क्यों? क्या जनता को यह जानने का अधिकार नहीं कि पाँच वर्षों में किस मंत्री की संपत्ति कितनी बढ़ी? कितनी भूमि खरीदी गई? कौन-कौन सी कंपनियों में हिस्सेदारी बढ़ी? परिवार के नाम कितनी नई संपत्तियाँ जुड़ीं? आय का स्रोत क्या रहा?

सवाल केवल संपत्ति का नहीं, पारदर्शिता का है। यदि सब कुछ वैध है, तो विवरण सार्वजनिक करने में भय कैसा? और यदि विवरण छिपाया जा रहा है, तो संदेह स्वाभाविक है। लोकतंत्र में गोपनीयता नहीं, जवाबदेही सर्वोपरि होती है।

प्रदेश में समय-समय पर भूमि, खनन, शराब, स्थानांतरण और ठेकों को लेकर गंभीर आरोप लगते रहे हैं। ऐसे वातावरण में यदि मंत्री स्वयं अपनी वार्षिक संपत्ति सार्वजनिक नहीं करते, तो अविश्वास और गहराता है। जनता आरोप नहीं, उत्तर चाहती है।

यह किसी दल विशेष का प्रश्न नहीं है। जो भी सत्ता में बैठे, उससे एक ही अपेक्षा होनी चाहिए—हर वर्ष आय और संपत्ति का सार्वजनिक लेखा-जोखा। इससे ईमानदार जनप्रतिनिधियों की प्रतिष्ठा भी बढ़ेगी और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में भी सहायता मिलेगी।

जनता के पाँच सीधे प्रश्न

मंत्री पद संभालने के बाद आपकी संपत्ति में कितना परिवर्तन हुआ?

आपकी और आपके परिवार की नई अचल संपत्तियाँ कौन-सी हैं?

उनकी खरीद का वैध आय स्रोत क्या है?

वार्षिक संपत्ति विवरण सार्वजनिक करने में आपत्ति क्यों?

क्या मध्य प्रदेश सरकार सुंदरलाल पटवा काल की पारदर्शिता की परंपरा पुनः लागू करेगी?

व्यंग्य की अंतिम पंक्ति

"जब जनता हर रुपये का कर देती है, तो मंत्री हर करोड़ का हिसाब देने से क्यों कतराते हैं? लोकतंत्र में कुर्सी सम्मान देती है, पर हिसाब माँगने का अधिकार जनता कभी नहीं छोड़ती।"

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