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भगवान के नाम पर भी बेईमानी? आखिर राम मंदिर चढ़ावा चोरी के कितने राजदार बाकी हैं!


प्रणव बजाज ( संपादकीय )

अयोध्या। करोड़ों श्रद्धालु रामलला के चरणों में चढ़ावा इसलिए चढ़ाते हैं कि वह भगवान की सेवा, मंदिर व्यवस्था और धर्मकार्य में लगे। लेकिन यदि उसी चढ़ावे में कथित गड़बड़ी के आरोप सामने आएं, एफआईआर दर्ज होने में 20 दिन लग जाएं, और जांच के बावजूद सवालों की संख्या जवाबों से ज्यादा हो, तो आस्था के साथ-साथ व्यवस्था भी कठघरे में खड़ी हो जाती है।


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इस मामले में अब तक 8 आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है। पुलिस की जांच में बैंक कर्मचारियों और ट्रस्ट से जुड़े कुछ पूर्व सदस्यों की भूमिका की भी पड़ताल की जा रही है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, चंपत राय पर एफआईआर दर्ज कराने में देरी और जानकारी छिपाने के आरोप लगाए गए हैं। वहीं, चंपत राय इन आरोपों से इनकार करते हुए कथित रूप से टिन्नू यादव पर भरोसा तोड़ने का आरोप लगा चुके हैं। इन सभी दावों की जांच जारी है और किसी की जिम्मेदारी अभी न्यायिक रूप से तय नहीं हुई है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल किसी एक व्यक्ति का नहीं, आस्था का है।

भगवान के नाम पर करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता है। ऐसे में क्या उसकी सुरक्षा और पारदर्शिता की जिम्मेदारी तय नहीं होनी चाहिए? आखिर ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं बनाई गई कि एक भी रुपया गायब होने की नौबत ही न आए?

आज देश का हिंदू समाज वर्षों बाद राम मंदिर निर्माण के सपने को साकार होते देख भावनात्मक रूप से जुड़ा है। ऐसे समय यदि चढ़ावे में कथित चोरी जैसे मामले सामने आते हैं, तो सबसे बड़ी चोट श्रद्धा और विश्वास पर पड़ती है।

जांच एजेंसियों को केवल आठ गिरफ्तारियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यदि इस पूरे प्रकरण में किसी बैंक अधिकारी, किसी कर्मचारी, किसी पूर्व ट्रस्ट सदस्य या किसी अन्य व्यक्ति की भूमिका है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। कोई भी कितना प्रभावशाली क्यों न हो, कानून सबके लिए समान होना चाहिए।

भगवान के घर में चढ़ाया गया दान राजनीति का नहीं, श्रद्धा का विषय है। इसलिए इस मामले में आधे-अधूरे जवाब नहीं, बल्कि पूरी सच्चाई सामने आनी चाहिए। कौन जिम्मेदार था? किसकी लापरवाही से यह कथित गड़बड़ी हुई? एफआईआर में देरी क्यों हुई? सुरक्षा व्यवस्था में चूक कहां हुई? इन सभी सवालों का जवाब देश जानना चाहता है।

राम मंदिर केवल एक भवन नहीं, करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। इसलिए इस मामले की जांच भी ऐसी होनी चाहिए कि भविष्य में कोई श्रद्धालु यह सोचने को मजबूर न हो कि "भगवान को चढ़ाया गया चढ़ावा भी सुरक्षित नहीं है।"

जब आस्था पर सवाल उठते हैं, तब सबसे पहले जवाबदेही तय होनी चाहिए—ताकि विश्वास बना रहे और सच सामने आए।

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