प्रणव बजाज
"घर पर लाखों करोड़ का कर्ज़, लेकिन बाहर ऐसा जश्न मानो खजाना छलक रहा हो!" यही तस्वीर आज मध्य प्रदेश सरकार की नजर आती है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव आज 352 करोड़ रुपये के विकास कार्यों का लोकार्पण और भूमिपूजन करेंगे। मंच सजेगा, फीते कटेंगे, फूल बरसेंगे, भाषण होंगे और सरकारी विज्ञापनों में विकास की नई गाथा लिखी जाएगी। लेकिन सवाल यह है कि यह विकास आखिर किसके पैसे से हो रहा है? सरकार की निजी तिजोरी से या जनता की जेब से?
प्रदेश पर करीब 5.31 लाख करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज़ है। हर साल हजारों करोड़ रुपये केवल ब्याज चुकाने में खर्च हो जाते हैं। यानी जनता टैक्स दे रही है, सरकार कर्ज़ ले रही है और फिर उसी पैसे से विकास का श्रेय भी खुद ले रही है।
सरकार बताती है कि उसने सैकड़ों करोड़ के विकास कार्य किए। जनता पूछती है—उनमें से कितने समय पर पूरे हुए? कितनों की गुणवत्ता ठीक है? कितने काम पहली बारिश में जवाब दे गए? कितनी परियोजनाएं सिर्फ शिलान्यास के पत्थरों तक सीमित रह गईं?
अब जल गंगा संवर्धन अभियान का भी खूब प्रचार हो रहा है। पोस्टर, होर्डिंग, भाषण और फोटोशूट सब तैयार हैं। लेकिन क्या सरकार यह भी बताएगी कि इस अभियान पर अब तक कुल कितनी राशि खर्च हुई? कितने जलस्रोत वास्तव में पुनर्जीवित हुए? कितने कार्यों का स्वतंत्र सामाजिक और तकनीकी ऑडिट हुआ? कितनी परियोजनाओं की गुणवत्ता की सार्वजनिक जांच हुई?
जनता का सवाल सीधा है—विकास का प्रचार बहुत हो गया, अब हिसाब भी दीजिए।
प्रदेश में वर्षों से अलग-अलग विभागों के कामकाज, निर्माण, ठेकों और योजनाओं को लेकर समय-समय पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं। यदि सरकार का दावा है कि सब कुछ पूरी तरह पारदर्शी है, तो फिर हर बड़े प्रोजेक्ट का खर्च, ठेकेदार, गुणवत्ता रिपोर्ट, भुगतान और ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती?
क्या कारण है कि विकास कार्यों के उद्घाटन पर करोड़ों रुपये प्रचार में खर्च हो जाते हैं, लेकिन कई सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं? स्कूलों में शिक्षकों की कमी है, किसान अपनी फसल का उचित मूल्य मांग रहे हैं और युवा रोजगार के लिए दूसरे राज्यों की ओर पलायन कर रहे हैं।
सरकार विकास का उत्सव मना रही है, जबकि जनता पूछ रही है—पहले कर्ज़ कम होगा या केवल नए-नए भूमिपूजन होते रहेंगे?
अगर विकास इतना अभूतपूर्व है, तो फिर प्रदेश की आर्थिक स्थिति लगातार कर्ज़ के सहारे क्यों चल रही है? अगर सब कुछ आदर्श है, तो जनता बार-बार पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग क्यों कर रही है?
लोकतंत्र में सरकार का काम जनता के पैसे से विकास करना ही है। इसमें कोई एहसान नहीं। असली सवाल यह है कि जनता के टैक्स और कर्ज़ के पैसे का एक-एक रुपया कहाँ खर्च हुआ, कितना स्थायी विकास हुआ और जिन योजनाओं पर सवाल उठे, उनकी निष्पक्ष जांच कब होगी?
आखिर जनता अब केवल लोकार्पण नहीं, पूरा लेखा-जोखा चाहती है।
क्योंकि लोकतंत्र में तालियां नहीं, हिसाब सबसे बड़ी उपलब्धि होती है।

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