फागुन का महीना आते ही मन के किसी कोने में बचपन की होली फिर से जीवित हो उठती है। आज जब रंगों का यह पर्व शहरों में औपचारिकता और शोर तक सिमटता दिखता है, तब स्मृतियों के पन्नों से मेरे छोटे से गांव सोयत की वह आत्मीय होली बार‑बार सामने आ खड़ी होती है। सच तो यह है कि त्योहार केवल उत्सव का अवसर नहीं होते, वे हमारे सामाजिक और पारिवारिक संस्कारों के जीवंत विद्यालय भी होते हैं।
मेरे बचपन में होली केवल रंग खेलने का दिन नहीं होती थी, बल्कि पूरे गांव की सामूहिक आत्मा का उत्सव होती थी। फागुन लगते ही गांव के चौक‑चौराहों पर हलचल बढ़ जाती थी। दादा‑दादी की आंखों में चमक और माता‑पिता की व्यस्तता यह बता देती थी कि रंगों का पर्व आने वाला है। घर की महिलाएं गुजिया, पापड़ी और खुरमा बनाने में जुट जातीं, तो बच्चे लकड़ियां इकट्ठी करने की होड़ में लगे रहते। उस समय न कोई कृत्रिमता थी, न दिखावा—सिर्फ अपनापन था।
सोयत के उस छोटे से गांव में होलिका दहन एक सामूहिक संस्कार की तरह होता था। पूरा गांव एक ही स्थान पर एकत्र होता, जगह को साफ कर गोबर से लीपा जाता और विधि‑विधान से होलिका स्थापित की जाती। दादा जी हमें बताते थे कि यह केवल अग्नि प्रज्ज्वलन नहीं, बल्कि मन के विकारों को जलाने का प्रतीक है। जब होलिका जलती, तो हम बच्चे उसकी परिक्रमा करते हुए मन ही मन अपनी छोटी‑छोटी इच्छाएं भी अग्नि को सौंप देते थे।
दूसरे दिन की होली तो जैसे रिश्तों का रंगमंच होती थी। सुबह होते ही पिता जी सबसे पहले बड़ों के चरण स्पर्श कर गुलाल लगाते और हमें भी यही संस्कार सिखाते। मां के आंचल की खुशबू में घुला गुलाल आज भी स्मृतियों में ताजा है। भाई‑बहनों के साथ रंगों की नोक‑झोंक, दोस्तों के साथ गलियों में दौड़‑भाग और रिश्तेदारों का घर‑घर आना—यह सब मिलकर होली को जीवंत बना देता था।
गांव की फाग मंडलियां देर रात तक ढोलक, झांझ और मंजीरों की थाप पर फाग गाती थीं। वह संगीत केवल कानों में नहीं, दिलों में उतरता था। देवर‑भाभी की मर्यादित नोक‑झोंक, बुजुर्गों की ठिठोली और बच्चों की खिलखिलाहट—इन सबके बीच होली सचमुच समरसता का पर्व बन जाती थी। किसी के मन में भय नहीं होता था कि कौन जबरन रंग डाल देगा या कोई असभ्यता करेगा। शालीनता ही उस उत्सव की असली पहचान थी।
समय बदला, जीवन की रफ्तार बढ़ी और त्योहारों का स्वरूप भी बदलने लगा। आज डीजे के तेज शोर में ढोलक की मधुर थाप दब गई है। प्राकृतिक रंगों की जगह रासायनिक रंगों ने ले ली है। पहले जो होली दिलों को जोड़ती थी, वह कई जगह केवल औपचारिकता या दिखावे का माध्यम बनती दिखाई देती है। पड़ोसी अब दरवाजे पर नहीं आते, संदेशों के माध्यम से शुभकामनाएं भेजकर कर्तव्य पूरा कर लिया जाता है।
यह परिवर्तन केवल परंपरा का नहीं, सामाजिक ताने‑बाने का भी संकेत है। त्योहारों का उद्देश्य मनुष्य को मनुष्य से जोड़ना था, लेकिन यदि वही उद्देश्य कमजोर पड़ने लगे तो आत्ममंथन आवश्यक हो जाता है। क्या हम अपनी नई पीढ़ी को वह आत्मीय होली दे पा रहे हैं, जो हमने अपने दादा‑दादी और माता‑पिता के साथ जी थी? क्या हमारे बच्चों के पास भी ऐसी स्मृतियां होंगी, जिन्हें वे वर्षों बाद उसी स्नेह से याद कर सकें?
सोयत के उस छोटे गांव की होली हमें यह सिखाती है कि त्योहारों की असली शक्ति सामूहिकता, शालीनता और प्रेम में निहित है। आधुनिकता का विरोध नहीं, बल्कि संतुलन आवश्यक है। तकनीक और सुविधा के इस युग में भी यदि हम रिश्तों की गर्माहट, बड़ों का सम्मान और बच्चों की निष्कपट खुशी बचा लें, तो होली की आत्मा सुरक्षित रह सकती है।
आवश्यक है कि हम फिर से अपने त्योहारों को उनके मूल स्वरूप से जोड़ें। प्राकृतिक रंगों का प्रयोग करें, मर्यादित हास‑परिहास को बढ़ावा दें और सबसे बढ़कर—अपने परिवार, मित्रों और पड़ोसियों के साथ समय बिताएं। जब तक होली दिलों को रंगती रहेगी, तब तक समाज में समरसता और सौहार्द के रंग फीके नहीं पड़ेंगे।
फागुन हर वर्ष आता है, रंग हर वर्ष उड़ते हैं, पर बचपन की वह होली बार‑बार नहीं आती। इसलिए आइए संकल्प लें कि आने वाली पीढ़ियों को हम केवल रंगों का पर्व नहीं, बल्कि रिश्तों की वह रंगभरी विरासत सौंपें, जिसकी खुशबू जीवन भर बनी रहती है।
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