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20 साल पुराने विवाद में इंदौर नगर निगम को बड़ी राहतMajor Relief for Indore Municipal Corporation in 20-Year-Old Dispute

 

हाईकोर्ट ने 13,42,359 रुपये के भुगतान संबंधी आदेश किया निरस्त, मामला फिर से सुनवाई के लिए भेजा

बिना उचित सुनवाई के पारित आदेश को अदालत ने माना कानून के विपरीत

इंदौर। लगभग दो दशक पुराने एक विवाद में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने इंदौर नगर निगम को महत्वपूर्ण कानूनी राहत प्रदान की है। अदालत ने मध्यप्रदेश इंडस्ट्री फसिलिटेशन काउंसिल द्वारा पारित भुगतान संबंधी आदेश तथा उसके आधार पर जिला न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय को निरस्त कर दिया है और पूरे मामले को पुनः सुनवाई के लिए काउंसिल के समक्ष भेज दिया है।  


यह निर्णय माननीय न्यायमूर्ति पवन कुमार द्विवेदी द्वारा पारित किया गया। प्रकरण में इंदौर नगर निगम की ओर से *अधिवक्ता अमेय बजाज* ने पैरवी की।

अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि किसी भी सांविधिक संस्था के विरुद्ध वित्तीय दायित्व निर्धारित करते समय उचित प्रक्रिया और सुनवाई का अवसर देना आवश्यक है। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत माना जाएगा।  

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी सार्वजनिक संस्था के विरुद्ध पारित किया गया आदेश तभी विधिसम्मत माना जा सकता है जब उस संस्था को समुचित नोटिस दिया गया हो और उसे अपने दस्तावेज एवं तर्क प्रस्तुत करने का अवसर मिला हो। न्यायालय ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्ष सुनवाई अत्यंत आवश्यक तत्व हैं।

1997 की निविदा से जुड़ा है मामला

मामला वर्ष 1997 में जारी की गई एक निविदा से जुड़ा है। इंदौर नगर निगम ने उस समय शहर के जूनि इंदौर और मालवा मिल स्थित श्मशान घाटों पर इलेक्ट्रिकल फर्नेस स्थापित करने के लिए निविदा जारी की थी।

निविदा प्रक्रिया के बाद संबंधित ठेकेदार को कार्य आदेश जारी किया गया और प्रत्येक फर्नेस के लिए लगभग 24.12 लाख रुपये की लागत निर्धारित की गई।  

यह परियोजना शहर के सार्वजनिक श्मशान घाटों में आधुनिक विद्युत दाह संस्कार प्रणाली स्थापित करने के उद्देश्य से शुरू की गई थी, ताकि पारंपरिक दाह संस्कार व्यवस्था के साथ-साथ एक आधुनिक और पर्यावरण अनुकूल विकल्प उपलब्ध कराया जा सके।

कार्य पूर्ण होने के पश्चात ठेकेदार द्वारा लगभग 50.97 लाख रुपये का बिल प्रस्तुत किया गया, जिसमें से नगर निगम ने नियमानुसार कटौतियों के बाद लगभग 42.67 लाख रुपये का भुगतान कर दिया। 

नगर निगम का कहना था कि कार्य के अनुसार भुगतान किया जा चुका है और अतिरिक्त राशि के दावे का परीक्षण आवश्यक है।

बाद में अतिरिक्त कार्य का दावा करते हुए वर्ष 005 में मध्यप्रदेश इंडस्ट्री फसिलिटेशन काउंसिल के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया गया।

काउंसिल ने भुगतान का दिया था निर्देश

काउंसिल ने 22 जून 2006 को पारित आदेश में नगर निगम को

 • 9,72,757 रुपये मूल राशि

 • 3,69,602 रुपये ब्याज

का भुगतान करने का निर्देश दिया था।  

यह आदेश उस समय विवाद का प्रमुख कारण बना और नगर निगम ने इसे चुनौती देने का निर्णय लिया। नगर निगम का कहना था कि मामले के तथ्य और दस्तावेजों पर पूर्ण विचार किए बिना ही आदेश पारित कर दिया गया।

इस आदेश को नगर निगम ने चुनौती देते हुए पहले हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। बाद में अदालत के निर्देशानुसार नगर निगम ने Arbitration and Conciliation Act, 1996 की धारा 34 के तहत जिला न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत किया, जिसे खारिज कर दिया गया था। इसके बाद मामला अपील के रूप में हाईकोर्ट में पहुंचा।

हाईकोर्ट ने माना – उचित प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और कार्यवाही का परीक्षण करते हुए पाया कि विवाद के निर्णय के दौरान सभी आवश्यक प्रक्रियाओं का समुचित पालन नहीं हुआ था और संबंधित पक्ष को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाया।

अदालत ने कहा कि किसी भी सार्वजनिक या सांविधिक संस्था के विरुद्ध आदेश पारित करते समय यह सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है कि संस्था को पूर्ण अवसर दिया जाए ताकि वह अपने दस्तावेज और पक्ष प्रस्तुत कर सके। ऐसा न होना न्यायिक प्रक्रिया के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है।  

न्यायालय ने यह भी कहा कि न्यायिक और अर्धन्यायिक संस्थाओं द्वारा पारित आदेशों में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन अत्यंत आवश्यक है। यदि किसी पक्ष को पर्याप्त अवसर दिए बिना आदेश पारित किया जाता है, तो ऐसे आदेश न्यायिक परीक्षण में टिक नहीं सकते।

‘पब्लिक पॉलिसी ऑफ इंडिया’ के विरुद्ध पाया गया आदेश

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि संबंधित आदेश “Public Policy of India” के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध पाया गया।

अदालत ने कहा कि भारतीय कानून व्यवस्था के मूलभूत सिद्धांतों में यह आवश्यक है कि किसी भी पक्ष के विरुद्ध वित्तीय दायित्व तय करने से पहले उसे अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिया जाए। यदि किसी संस्था को सुनवाई का अवसर ही नहीं दिया जाता, तो ऐसा आदेश न्यायिक दृष्टि से टिकाऊ नहीं माना जा सकता।  

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी सांविधिक संस्था के विरुद्ध सहमति आधारित आदेश पारित करते समय यह सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है कि वह सहमति विधिवत और सक्षम प्राधिकारी द्वारा दी गई हो। अन्यथा ऐसी कार्यवाही न्याय के मूलभूत सिद्धांतों के विपरीत मानी जाएगी।

अदालत के अनुसार यदि ऐसी प्रक्रिया को मान्यता दे दी जाए तो इससे सार्वजनिक संस्थाओं के विरुद्ध अनुचित वित्तीय दायित्व उत्पन्न हो सकते हैं, जो भारतीय विधिक व्यवस्था और सार्वजनिक नीति के सिद्धांतों के विपरीत होगा।  

दोनों आदेश निरस्त, मामला दोबारा सुना जाएगा

इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने

 • मध्यप्रदेश इंडस्ट्री फसिलिटेशन काउंसिल का 22 जून 2006 का आदेश

 • तथा जिला न्यायालय द्वारा 16 जनवरी 2018 को पारित आदेश

दोनों को निरस्त कर दिया।  

अदालत ने पूरे मामले को पुनः मध्यप्रदेश इंडस्ट्री फसिलिटेशन काउंसिल के समक्ष भेजते हुए निर्देश दिया कि विवाद की सुनवाई सभी पक्षों को अवसर देते हुए की जाए और यथासंभव छह माह के भीतर निर्णय किया जाए। 

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि विवाद काफी पुराना है और न्यायिक प्रक्रिया को अनावश्यक रूप से लंबित नहीं रखा जाना चाहिए। इसलिए संबंधित प्राधिकरण को समयबद्ध तरीके से मामले का निराकरण करने का निर्देश दिया गया है।

निगम को मिली बड़ी कानूनी और आर्थिक राहत

हाईकोर्ट के इस निर्णय को इंदौर नगर निगम के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी राहत के रूप में देखा जा रहा है।

अधिवक्ता अमेय बजाज ने बताया की, इस आदेश के बाद पुराने विवाद में निगम पर लगाए गए भुगतान संबंधी दायित्व को निरस्त कर दिया गया है और अब पूरे मामले की पुनः सुनवाई होगी, जिससे निगम को अपना पक्ष विस्तार से रखने का अवसर मिलेगा।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्णय सार्वजनिक संस्थाओं से जुड़े मामलों में न्यायिक प्रक्रिया के महत्व को भी रेखांकित करता है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी सरकारी या सांविधिक संस्था के विरुद्ध वित्तीय दायित्व तय करते समय विधिसम्मत प्रक्रिया और सुनवाई का अवसर अनिवार्य है।

20 साल की कानूनी लड़ाई (Timeline)

1997 – इंदौर नगर निगम ने इलेक्ट्रिकल फर्नेस स्थापना के लिए निविदा जारी की।

1998 – कार्य आदेश जारी किया गया और परियोजना शुरू हुई।

2003–2005 – कार्य पूर्ण होने के बाद भुगतान से जुड़ा विवाद उत्पन्न हुआ।

2005 – ठेकेदार ने मध्यप्रदेश इंडस्ट्री फसिलिटेशन काउंसिल में आवेदन प्रस्तुत किया।

2006 – काउंसिल ने नगर निगम को भुगतान करने का आदेश दिया।

2011 – मामले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में रीट याचिका दायर की गई।

2012–2018 – जिला न्यायालय में धारा 34, आर्बिट्रेशन एक्ट के तहत सुनवाई हुई।

2018 - जिला न्यायालय द्वारा निगम के विरुद्ध आदेश पारित किया गया जिसके विरुद्ध निगम द्वारा हाई कोर्ट में अपील करी गई 

2026 – हाईकोर्ट ने दोनों आदेश निरस्त कर मामला पुनः सुनवाई के लिए भेजा

हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ

 • किसी भी सांविधिक संस्था के विरुद्ध आदेश पारित करने से पहले उसे उचित सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है।

 • यदि किसी पक्ष को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया जाता तो ऐसा आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध माना जाएगा।

 • न्यायिक और अर्धन्यायिक संस्थाओं को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी पक्षों को दस्तावेज और तर्क प्रस्तुत करने का पूरा अवसर मिले।

 • सार्वजनिक संस्थाओं के विरुद्ध पारित आदेशों को भारतीय सार्वजनिक नीति (Public Policy of India) के मूल सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए।

 • पुराने विवादों का समाधान समयबद्ध तरीके से किया जाना आवश्यक है।

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