दीप्ति डांगे
मुम्बई
कभी जो हवाई यात्रा सुविधा, सम्मान और भरोसे का प्रतीक मानी जाती थी, आज वही आम यात्रियों के लिए तनाव, लूट और असुरक्षा का कारण बनती जा रही है
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देश में सीमित हवाई जहाज कंपनियों के कारण एक तरह की मोनोपॉली बन चुकी है, जिसका सीधा नुकसान यात्रियों को भुगतना पड़ रहा है। पहले हवाई यात्रा सबसे सुरक्षित मानी जाती थी आज कल ये यात्रा असुरक्षित होती जा रही है क्योंकि हवाई जहाजों में तकनीकी खराबियों, इमरजेंसी लैंडिंग और दुर्घटनाओं की खबरे बढ़ती जा रही है। नागर विमानन महानिदेशालय (DGCA) द्वारा किए गए विभिन्न निरीक्षणों में ज्यादातर विमानों में तकनीकी त्रुटियाँ और सुरक्षा मानकों की अनदेखी पाई गई। कहीं इंजन से जुड़ी खामियाँ मिलीं, तो कहीं मेंटेनेंस रिकॉर्ड में गड़बड़ी।सवाल यह है कि जब निरीक्षण में खामियाँ मिल रही हैं, तो यात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा
धीरे धीरे भारतीय विमानन क्षेत्र में गिनी-चुनी कंपनियाँ ही सक्रिय हैं। प्रतिस्पर्धा कम होने का सीधा असर यह हुआ है कि टिकट के दाम मनमाने ढंग से बढ़ाए जाते। त्योहार हो, आपात स्थिति हो या छुट्टियों का मौसम ,किराए आसमान छूने लगते हैं, लेकिन सेवा का स्तर लगातार गिरता जा रहा है।पहले हवाई यात्रा में सीट का चयन मुफ्त होता था, आज सीट चुनने के लिए भी अतिरिक्त शुल्क देना पड़ता है। खिड़की वाली सीट चाहिए तो पैसा, आगे बैठना है तो पैसा।
यानी टिकट के नाम पर सिर्फ यात्रा नहीं, बल्कि हर सुविधा अब एक अलग प्रोडक्ट बन चुकी है।
एक समय था जब फ्लाइट में सम्मानजनक भोजन परोसा जाता था। आज स्थिति यह है कि या तो महँगा पैक्ड फूड खरीदिए, या फिर मजबूरी में घटिया क्वालिटी का फास्ट फूड स्वीकार कीजिए।यह बदलाव केवल सुविधा में कटौती नहीं, बल्कि यात्रियों के स्वास्थ्य के साथ भी समझौता है।
अब घंटों का इंतज़ार,
फ्लाइट डिले कोई अपवाद नहीं, बल्कि सामान्य बात हो गई है।कभी तकनीकी कारण, कभी ऑपरेशनल समस्या यात्रियों को घंटों एयरपोर्ट पर बैठाकर रखा जाता है, न तो सही जानकारी दी जाती है, न ही उचित मुआवज़ा।
बुज़ुर्ग, बच्चे और बीमार यात्री इस अव्यवस्था के सबसे बड़े शिकार बनते हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब किराए बढ़ रहे हैं, सुविधाएँ घट रही हैं और सुरक्षा पर सवाल उठ रहे हैं, तो नियामक संस्थाएँ क्या कर रही हैं?
जब जनता मीडिया इस बात को जोर शोर से उठाती है तो सरकार जुर्माना लगा देती है ओर उसके सर्किल कम कर देती है।क्या एयरलाइंस पर सिर्फ जुर्माना काफी है, या यात्रियों के हित में सख्त कार्रवाई की ज़रूरत है?
विमानन क्षेत्र केवल निजी कंपनियों का कारोबार नहीं, बल्कि सार्वजनिक महत्व की सेवा है। इसलिए इसकी सुरक्षा, पारदर्शिता और यात्री हितों की रक्षा करना सरकार और नियामक संस्थाओं की जिम्मेदारी है।ओर उसको पारदर्शिता से निभाना चाहिये।
सबसे पहले, DGCA को सुरक्षा मानकों पर सख्त और नियमित निगरानी सुनिश्चित करनी चाहिए। निरीक्षण केवल औपचारिक न हों, बल्कि प्रभावी हों, और गंभीर खामियाँ मिलने पर कड़ी कार्रवाई हो।
दूसरा, टिकटों के मनमाने दामों पर नियंत्रण और पारदर्शिता जरूरी है, खासकर आपात या त्योहारों के समय, ताकि यात्रियों का शोषण न हो।
तीसरा, फ्लाइट देरी या रद्द होने की स्थिति में यात्रियों को भोजन, सही सूचना और मुआवज़ा मिलना उनका अधिकार है, उपकार नहीं।
सबसे महत्वपूर्ण, सरकार को नई विमानन कंपनियों के लिए अवसर बढ़ाने चाहिए और क्षेत्र में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करना चाहिए। अधिक खिलाड़ियों के आने से मोनोपॉली कम होगी, किराए संतुलित रहेंगे और सेवाओं की गुणवत्ता बेहतर होगी।
सरकार को भी हवाई यात्रा को केवल मुनाफे का साधन नहीं, बल्कि सुरक्षित, सुलभ और यात्री-हितैषी सेवा बनाया जाए।
आज हवाई यात्रा कोई लग्ज़री नहीं, बल्कि आज के समय में आवश्यक परिवहन सेवा बन चुकी है।
लेकिन जब मुनाफा ही सर्वोपरि हो जाए और यात्री केवल ग्राहक बनकर रह जाए, तब सवाल उठना लाज़मी है।
हवाई यात्रा का उद्देश्य समय बचाना और सुविधा देना है, न कि तनाव बढ़ाना। मुनाफा किसी भी उद्योग का हिस्सा हो सकता है, लेकिन जब लाभ की दौड़ में सुरक्षा और सेवा पीछे छूटने लगे, तो हस्तक्षेप अनिवार्य हो जाता है।
अब समय है कि विमानन क्षेत्र में संतुलन स्थापित किया जाए, जहाँ कंपनियाँ लाभ कमाएँ, लेकिन यात्रियों की सुरक्षा, सुविधा और अधिकारों की कीमत पर नहीं।

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