बिना तारीख और संदिग्ध विक्रय अनुबंध पर सेशन कोर्ट ने जताई आपत्ति, कहा — यह बिक्री नहीं बल्कि उधारी का मामला
इंदौर के रजिस्ट्रार कार्यालय में पदस्थ उप पंजीयक अरविंद खरे द्वारा 50 करोड़ रुपए मूल्य की जमीन को मात्र 1 करोड़ 75 लाख रुपए में खरीदने का दावा अदालत में टिक नहीं पाया। जिला न्यायालय ने इस पूरे मामले को संदिग्ध मानते हुए उनका निषेधाज्ञा वाद खारिज कर दिया है।
मामला ग्राम हुकमा खेड़ी स्थित 0.308 हेक्टेयर (लगभग 33,152 वर्ग फीट) जमीन का है, जिसका बाजार मूल्य करीब 50 करोड़ रुपए और गाइडलाइन मूल्य लगभग 15 करोड़ रुपए बताया जा रहा है। इस जमीन को लेकर अरविंद खरे ने दावा किया था कि उन्होंने सुरेंद्र सिंह और सुरजीत सिंह अरनेजा से 1 करोड़ 75 लाख रुपए में विक्रय अनुबंध किया है।
हालांकि, न्यायालय में प्रस्तुत अनुबंध पर गंभीर सवाल खड़े हुए। दस्तावेज में किसी प्रकार की तारीख अंकित नहीं थी, जबकि क्रेता का नाम बाद में हाथ से जोड़ा गया पाया गया। न्यायालय ने इसे विधिसम्मत विक्रय अनुबंध नहीं माना।
अरविंद खरे ने अपने दावे में बताया था कि उन्होंने 1 करोड़ 70 लाख रुपए विभिन्न तिथियों में भुगतान किए हैं और शेष 5 लाख रुपए देना बाकी है। वहीं, अरनेजा बंधुओं ने इस अनुबंध को पूरी तरह फर्जी और बनावटी बताते हुए न्यायालय में चुनौती दी।
दिनांक 26 मार्च 2026 को न्यायाधीश वर्षा भाटी ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि प्रस्तुत दस्तावेज बिक्री का नहीं बल्कि उधार लेन-देन का प्रतीत होता है। साथ ही यह भी कहा गया कि एक शासकीय सेवक द्वारा इतनी बड़ी राशि का भुगतान किया जाना स्वयं में संदेह उत्पन्न करता है।
न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि कथित विक्रय अनुबंध कहीं से भी पंजीकृत नहीं है और उसमें असत्य कथन तथा विभिन्न तिथियों में भुगतान का उल्लेख किया गया है। इन आधारों पर अरविंद खरे का निषेधाज्ञा वाद खारिज कर दिया गया।
इस पूरे प्रकरण के सामने आने के बाद अब यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि एक सरकारी अधिकारी के पास इतनी बड़ी धनराशि कहां से आई और क्या फर्जी दस्तावेजों के आधार पर न्यायालय को गुमराह करने का प्रयास किया गया। मामला लोकायुक्त और राज्य सरकार के लिए जांच का विषय बनता जा रहा है।

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