बिश्केक। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के 26वें शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक पहुंचे हैं। ऐसे समय में हो रही यह बैठक भारत के लिए केवल एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक राजनीति में अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करने का बड़ा अवसर मानी जा रही है।
एससीओ की शुरुआत वर्ष 2001 में चीन, रूस और मध्य एशियाई देशों के सहयोग मंच के रूप में हुई थी। आज भारत, पाकिस्तान, ईरान और बेलारूस समेत इसके 10 पूर्ण सदस्य हैं। संगठन से जुड़े देशों की आबादी दुनिया की करीब 43 प्रतिशत और वैश्विक अर्थव्यवस्था में लगभग 23 प्रतिशत हिस्सेदारी रखती है। सुरक्षा, आतंकवाद, व्यापार, संपर्क और क्षेत्रीय स्थिरता इसके प्रमुख मुद्दे हैं।
इस बार सम्मेलन का महत्व इसलिए ज्यादा है क्योंकि एक ही मंच पर मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन मौजूद हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया का संकट, ईरान की स्थिति, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक व्यापार व्यवस्था जैसे मुद्दे दुनिया की राजनीति को नई दिशा दे रहे हैं।
भारत की रणनीति साफ दिखाई देती है—सुरक्षा, संपर्क और अवसर। भारत मध्य एशिया तक व्यापारिक पहुंच बढ़ाने, चाबहार बंदरगाह और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे जैसे विकल्पों को मजबूत करना चाहता है। साथ ही आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को घेरना और चीन के साथ मतभेदों के बावजूद संवाद बनाए रखना भी भारत की कूटनीतिक प्राथमिकता है।
मोदी ने बिश्केक पहुंचने के बाद किर्गिस्तान के राष्ट्रपति सादिर जापारोव से रणनीतिक साझेदारी पर चर्चा की। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के साथ मुलाकात में भी व्यापार और क्षेत्रीय शांति महत्वपूर्ण मुद्दे रहे।
**असल सवाल यही है कि क्या बिश्केक से भारत चीन और रूस के साथ नए समीकरण बनाएगा, या फिर अपने हितों की स्वतंत्र राह पर चलते हुए एससीओ को केवल एक कूटनीतिक मंच की तरह इस्तेमाल करेगा? आने वाले दो दिन इसका जवाब देने वाले हैं।**

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