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NDA का “Mission 360” और लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत की रणनीति

 

(विशेष रिपोर्ट)

प्रणव बजाज

नई दिल्ली की राजनीति में इस समय सबसे बड़ा फोकस “Mission 360” पर है—यानी लोकसभा में संविधान संशोधन के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत हासिल करना। मौजूदा समीकरणों के अनुसार, कुल 540 सक्रिय सदस्यों वाली लोकसभा में यह आंकड़ा करीब 360 वोटों के आसपास बैठता है। यही वह टारगेट है जिसके लिए सत्ता पक्ष लगातार रणनीतिक विस्तार और राजनीतिक पुनर्संयोजन में जुटा है।


 

NDA की मौजूदा स्थिति और कमी

ताज़ा राजनीतिक गणित के अनुसार NDA के पास लगभग 318–319 सांसदों का समर्थन माना जा रहा है। यानी उसे अभी भी करीब 41–45 सांसदों की कमी बनी हुई है, जिसे पूरा किए बिना संविधान संशोधन जैसे बड़े फैसले संभव नहीं हैं। 

इसी वजह से सत्ताधारी गठबंधन का ध्यान अब सिर्फ सहयोगी दलों तक सीमित नहीं है, बल्कि विपक्षी खेमे में सेंध लगाने की रणनीति पर भी केंद्रित बताया जा रहा है।

DMK, NCP (SP) और सपा पर नजर क्यों?

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि NDA की रणनीति अब तीन बड़े क्षेत्रीय दलों पर केंद्रित हो सकती है—

DMK (तमिलनाडु)

NCP (शरद पवार गुट)

समाजवादी पार्टी (SP)

इन दलों के पास अकेले ही 60+ सांसदों का प्रभाव है, जो किसी भी बड़े संवैधानिक बहुमत समीकरण को बदल सकते हैं। हाल के महीनों में विपक्षी खेमे में टूट-फूट और असंतोष की खबरों ने इस संभावना को और हवा दी है। 

राजनीतिक लक्ष्य क्या है?

अगर NDA इस अंतर को भर लेता है, तो उसके लिए तीन बड़े एजेंडा आसान हो सकते हैं—

परिसीमन (Delimitation)

लोकसभा सीटों का पुनर्गठन

महिलाओं के आरक्षण से जुड़े संवैधानिक बदलाव

इन्हीं कारणों से इसे “मिशन 360” नाम दिया गया है—जो सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि भारत के संसदीय ढांचे में बड़े बदलाव की राजनीतिक तैयारी मानी जा रही है। 

क्या यह लक्ष्य आसान है?

वर्तमान स्थिति बताती है कि लक्ष्य अभी भी कठिन है। भले ही कुछ दलों में विभाजन या समर्थन की संभावना दिख रही हो, लेकिन दो-तिहाई बहुमत हासिल करना केवल गठबंधन विस्तार से नहीं, बल्कि स्थायी राजनीतिक समर्थन से ही संभव होगा।

निष्कर्ष

“Mission 360” सिर्फ एक संख्या का खेल नहीं है, बल्कि आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति की दिशा तय करने वाली रणनीति बनता दिख रहा है। NDA की कोशिश है कि वह इस आंकड़े तक पहुंचकर संवैधानिक सुधारों के नए दौर की शुरुआत करे, जबकि विपक्ष इसे सत्ता संतुलन बदलने की कोशिश के रूप में देख रहा है।

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