इंदौर विकास की दौड़ में आगे है, लेकिन रफ्तार की इस दौड़ में इंसानी ज़िंदगियाँ पीछे छूटती जा रही हैं।
आंकड़े बताते हैं कि जिले के 31 ब्लैक स्पॉट पर पिछले साढ़े तीन वर्षों में 239 लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें 10 स्थान बेहद खतरनाक माने गए हैं। सवाल यह है कि जब इन जगहों की पहचान सरकार और प्रशासन को पहले से है, तो फिर मौत का यह सिलसिला क्यों नहीं रुक रहा?
हर हादसे के बाद वही पुराना बयान—"जांच होगी", "सुधार किए जाएंगे", "निर्देश दे दिए गए हैं"। लेकिन सड़क पर उतरते ही सच्चाई सामने आ जाती है। कहीं अंधा मोड़, कहीं टूटी सड़क, कहीं रोशनी नहीं, कहीं संकेतक गायब।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि ब्लैक स्पॉट पहले घोषित होते हैं, सुधार बाद में भी नहीं होते, लेकिन मौतें समय पर होती रहती हैं।
सरकार विकास के बड़े-बड़े दावे करती है, करोड़ों रुपये की परियोजनाओं का उद्घाटन होता है, लेकिन यदि वर्षों से चिन्हित खतरनाक स्थानों को भी सुरक्षित नहीं बनाया जा सकता, तो विकास के दावों का अर्थ क्या रह जाता है?
सवाल विपक्ष से नहीं, सत्ता से है। सवाल राजनीति से नहीं, जवाबदेही से है।
239 मौतें कोई आंकड़ा नहीं, 239 परिवारों का उजड़ना है।
क्या अगली समीक्षा बैठक में फिर केवल फाइलें पलटी जाएंगी, या इस बार उन सड़कों को भी देखा जाएगा जहाँ हर कुछ दिनों में किसी घर का चिराग बुझ जाता है?
सरकार कब तक ख़ामोश रहेगी? या अगली मौत का इंतज़ार है?

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