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स्वच्छता का ताज, जाम का राज! क्या इंदौर केवल पुरस्कारों से चलेगा?

 

प्रणवबजाज

इंदौर वर्षों से देश का सबसे स्वच्छ शहर कहलाता है। हर बार पुरस्कार मिलते हैं, मंच सजते हैं, भाषण होते हैं और शहर की उपलब्धियों का ढोल पीटा जाता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या स्वच्छता ही किसी शहर के विकास का अंतिम पैमाना है? यदि सड़कों पर घंटों जाम लगा रहे, गड्ढों में वाहन टूटें, एम्बुलेंस फंस जाए, मरीज तड़पें और नागरिक रोज़ परेशान हों, तो क्या केवल ट्रॉफियां जनता की तकलीफ कम कर सकती हैं?


आज खजराना चौराहा, बंगाली चौराहा, वर्ल्ड कप चौराहा और शहर के अनेक मार्ग घंटों जाम में डूबे रहे। हजारों लोग समय पर दफ्तर नहीं पहुंच सके, विद्यार्थी परीक्षा और कक्षाओं के लिए परेशान हुए, व्यापार प्रभावित हुआ और लाखों रुपये का ईंधन धुएं में उड़ गया। मगर जिम्मेदार तंत्र की चुप्पी नहीं टूटी।

ऐसा लगता है कि प्रशासन की सक्रियता केवल बैठकों, प्रस्तुतियों और प्रेस विज्ञप्तियों तक सीमित होकर रह गई है। जनता पूछ रही है—क्या अधिकारी कभी बिना काफिले के इन जामों में खड़े हुए हैं? क्या किसी मंत्री ने आम नागरिक की तरह दो घंटे ट्रैफिक में फंसकर देखा है?

चुनाव के समय यही नेता हर गली-मोहल्ले में दिखाई देते हैं। हाथ जोड़कर विकास के वादे करते हैं। चुनाव बीतते ही जनता फिर जाम में खड़ी रह जाती है और जनप्रतिनिधि वातानुकूलित कमरों में विकास की समीक्षा करते रहते हैं।

सबसे बड़ा सवाल विपक्ष पर भी है। लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष सरकार की जवाबदेही तय करता है, लेकिन जब विपक्ष कमजोर हो जाए या जनता की आवाज़ बुलंद न कर पाए, तब सत्ता पर दबाव भी कम हो जाता है। इसका खामियाजा आखिरकार आम नागरिक ही भुगताता है।

एक और सवाल शहर के बार-बार मिलने वाले स्वच्छता पुरस्कारों को लेकर भी उठता है। जनता के बीच यह चर्चा रहती है कि क्या केवल पुरस्कार मिल जाने से शहर की सभी समस्याएं समाप्त मान ली जाएं? स्वच्छता निश्चित रूप से गर्व का विषय है, लेकिन उसके साथ सुगम यातायात, सुरक्षित सड़कें और जवाबदेह प्रशासन भी उतना ही आवश्यक है।

अब समय आ गया है कि रोज़ जनता को बताया जाए—आज कितने गड्ढे भरे गए, कौन-सी सड़क सुधरी, किस चौराहे पर जाम कम हुआ और किस अधिकारी ने मौके पर जाकर निरीक्षण किया। विकास का प्रमाण प्रेस नोट नहीं, बल्कि जनता की राहत होनी चाहिए।

व्यंग्य यही है कि इंदौर आज भी सबसे स्वच्छ कहलाता है, लेकिन अगर हालात नहीं बदले तो लोग कहेंगे—"शहर चमक रहा है, व्यवस्था जाम में फंसी है।"

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