प्रणव बजाज
प्रदेश में इन दिनों विकास की रफ्तार पर कोई बहस नहीं है,
बहस इस बात पर है कि सवाल कितनी तेजी से उठ रहे हैं और जवाब कितनी कुशलता से गायब हो रहे हैं।
ज़मीन के सौदों पर चर्चा है,
ट्रांसफर की फाइलों पर फुसफुसाहट है,
शराब नीति के पुराने किस्से फिर हवा में हैं,
और करोड़ों के कर्ज़ की गिनती जनता खुद जोड़ रही है—
लेकिन सत्ता का गणित बिल्कुल साफ है:
“जो पूछा जा रहा है, वो सुनाई नहीं दे रहा।”
यहाँ सबसे बड़ी उपलब्धि यह हो गई है कि
हर गंभीर सवाल का जवाब अब एक ही शब्द में मिल जाता है—
“राजनीति।”
और अगर सवाल ज्यादा बढ़ जाएँ तो दूसरा विकल्प तैयार है—
“भ्रम फैलाया जा रहा है।”
कमाल की व्यवस्था है—
जहाँ जवाब देने की जरूरत नहीं,
बस जवाब देने से बचने की कला पर्याप्त है।
विपक्ष सवाल पूछता है तो उसे “अराजकता” कहा जाता है,
जनता पूछे तो उसे “अफवाह” घोषित कर दिया जाता है,
और अगर मीडिया पूछ ले तो उसे “एजेंडा” बता दिया जाता है।
यानी सवालों के तीन स्तर पर इलाज उपलब्ध है—
नाम बदल दो, अर्थ बदल दो, या फिर चुप्पी साध लो।
सबसे रोचक दृश्य यह है कि
जितने तेज़ आरोप घूम रहे हैं,
उतनी ही स्थिर सरकार की चुप्पी है—
जैसे किसी प्रशासनिक आदेश से तय हो गया हो कि
“जवाब देना अनिवार्य नहीं है।”
और अदालतें?
वहाँ समय अपनी सबसे धीमी चाल में चलता है—
इतनी धीमी कि जनता को लगने लगता है,
शायद न्याय भी अब “फाइल के नीचे दबकर ध्यान कर रहा है।”
लेकिन असली मुद्दा ये नहीं है कि कौन सही है और कौन गलत,
असली मुद्दा यह है कि
इतने सवालों के बीच भी सत्ता इतनी निश्चिंत कैसे है
क्या सब कुछ सच में पारदर्शी है,
या पारदर्शिता सिर्फ एक शब्द बनकर रह गई है?
लोकतंत्र में मौन कभी-कभी रणनीति होता है,
लेकिन जब मौन ही प्रणाली बन जाए,
तो सवाल विपक्ष के नहीं रहते—
वे जनता की बेचैनी बन जाते हैं।
और सबसे तीखी सच्चाई यही है—
सरकारें भाषणों से नहीं, जवाबों से मजबूत होती हैं,
और जब जवाब गायब हों, तो भाषण सिर्फ शोर बन जाते हैं।

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