नई दिल्ली। ने कहा कि 1947 के देश विभाजन के बाद पाकिस्तान से भारत आने वाले लोगों को केवल शरणार्थी कहना उचित नहीं है। उनके अनुसार, वे अपनी मातृभूमि, संस्कृति और धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले योद्धा थे, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भारत आने का निर्णय लिया।
मोहन भागवत ने कहा कि विभाजन के दौरान लाखों लोगों ने अत्यंत कठिन परिस्थितियों का सामना किया, लेकिन उन्होंने अपने मूल्यों और आस्था से समझौता नहीं किया। उन्होंने कहा कि भारत आने का उनका निर्णय मजबूरी भर नहीं था, बल्कि अपनी पहचान और सांस्कृतिक विरासत को बचाने का एक सचेत और साहसिक कदम था।
उन्होंने कहा कि जीवन में संघर्ष आते हैं, लेकिन कठिन परिस्थितियों के सामने कभी हार नहीं माननी चाहिए। इतिहास उन लोगों को याद रखता है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों और लक्ष्य पर अडिग रहते हैं।
संघ प्रमुख ने कहा कि विभाजन की त्रासदी से मिली सीख आज भी समाज को एकजुटता, धैर्य और राष्ट्रहित में कार्य करने की प्रेरणा देती है। उन्होंने लोगों से इतिहास को स्मरण रखते हुए भविष्य को मजबूत बनाने की दिशा में कार्य करने का आह्वान किया।

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