‘
कोलकाता। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं की पुलिस द्वारा सार्वजनिक रूप से परेड कराए जाने के मामले में ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने स्वत: संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन से सवाल किया कि क्या किसी आरोपी को इस तरह सरेआम घुमाना "कानून के शासन" (Rule of Law) के अनुरूप है।
मामला उन तस्वीरों और वीडियो के सामने आने के बाद उठा, जिनमें टीएमसी से जुड़े नेताओं—जहांगीर खान, गुड्डू अंसारी, आकाश सिंह और अभिजीत समेत अन्य आरोपियों को पुलिस सुरक्षा के बीच सार्वजनिक रूप से ले जाते हुए देखा गया। इन दृश्यों को लेकर राजनीतिक और कानूनी बहस तेज हो गई है।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप लगना और उसका दोषी सिद्ध होना दो अलग-अलग बातें हैं। अदालत ने पूछा कि क्या जांच एजेंसियों को कानून के दायरे में रहकर काम नहीं करना चाहिए और क्या सार्वजनिक परेड से आरोपियों के संवैधानिक अधिकार प्रभावित नहीं होते?
अदालत ने राज्य सरकार से विस्तृत रिपोर्ट तलब करते हुए पूछा कि आरोपियों को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने की आवश्यकता क्यों पड़ी और इसके लिए कौन-से कानूनी प्रावधानों का पालन किया गया। कोर्ट ने यह भी जानना चाहा कि क्या इस कार्रवाई के लिए कोई स्पष्ट प्रशासनिक आदेश जारी किया गया था।
विपक्षी दलों ने मामले को लेकर राज्य सरकार पर निशाना साधा है। उनका आरोप है कि कानून का इस्तेमाल राजनीतिक संदेश देने के लिए किया जा रहा है। वहीं सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि कानून अपना काम कर रहा है और जांच एजेंसियां निर्धारित प्रक्रिया के तहत कार्रवाई कर रही हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के संविधान में प्रत्येक आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई और गरिमा के साथ व्यवहार का अधिकार प्राप्त है। ऐसे मामलों में अदालतें पहले भी पुलिस और जांच एजेंसियों को यह याद दिलाती रही हैं कि किसी व्यक्ति को दोषी साबित होने से पहले अपराधी की तरह सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत करना न्यायिक सिद्धांतों के विपरीत माना जा सकता है।

Post a Comment