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अपनी ही सरकार के खिलाफ धरने पर बैठे बीजेपी विधायक, पन्नालाल शाक्य के समर्थन में कांग्रेस और AAP, सियासत गरमाईPolitics heats up as BJP MLA Pannalal Shakya stages protest against his own government; Congress and AAP support him

 

बौद्धिक प्रतिकार | प्रणव बजाज


मध्य प्रदेश में बिजली संकट को लेकर सियासत तेज हो गई है। गुना जिले में लगातार हो रही बिजली कटौती के विरोध में भाजपा विधायक पन्नालाल शाक्य अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए बिजली विभाग के कार्यालय के बाहर धरने पर बैठ गए। विधायक के इस कदम ने प्रदेश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है।


क्षेत्र की जनता और किसानों की समस्याओं को लेकर धरने पर बैठे शाक्य ने बिजली विभाग के अधिकारियों के साथ-साथ ऊर्जा विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि बार-बार शिकायतों के बावजूद बिजली आपूर्ति में सुधार नहीं हो रहा है, जिससे आम जनता और किसान दोनों परेशान हैं।

इस पूरे घटनाक्रम ने तब और तूल पकड़ लिया जब भाजपा छोड़कर आम आदमी पार्टी में शामिल हो चुकी पूर्व विधायक ममता मीना और कांग्रेस नेता जयवर्धन सिंह भी पन्नालाल शाक्य के समर्थन में उतर आए। ममता मीना ने भाजपा की वर्तमान कार्यशैली पर निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी में पुराने और जमीनी नेताओं की उपेक्षा की जा रही है तथा उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा।

उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश में बिजली संकट गंभीर है, लेकिन जिम्मेदार मंत्री वास्तविक समस्याओं का समाधान करने के बजाय केवल दिखावटी गतिविधियों में व्यस्त हैं। वहीं कांग्रेस नेता जयवर्धन सिंह ने भी सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि जनता को पर्याप्त बिजली उपलब्ध कराने में सरकार पूरी तरह विफल साबित हो रही है।

इस बीच सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो ने भी राजनीतिक माहौल को गर्मा दिया है। वीडियो में प्रभारी मंत्री गोविंद सिंह राजपूत और विधायक पन्नालाल शाक्य के बीच हुई कथित धक्का-मुक्की को लेकर विपक्ष सरकार पर हमलावर है। विपक्षी दल इसे भाजपा के भीतर बढ़ते असंतोष का संकेत बता रहे हैं।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि सत्तारूढ़ दल के विधायक ही जनता की समस्याओं को लेकर सड़क पर उतरने को मजबूर हैं, तो यह सरकार और प्रशासन के बीच समन्वय की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े करता है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा प्रदेश की राजनीति में और बड़ा रूप ले सकता है।

कटाक्ष: "जब जनता की आवाज सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुंचती, तो कभी-कभी सत्ता पक्ष के नेताओं को भी विपक्ष की भूमिका निभानी पड़ती है। सवाल यह है कि आखिर जनता की सुनवाई होगी कब?"

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