इंदौर। प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में खाद्य पदार्थों में मिलावट को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि खाद्य सुरक्षा विभाग पूरे साल में महज गिने-चुने नमूने लेकर औपचारिकता निभा रहा है, जबकि मिलावटखोर जुर्माना भरकर आसानी से बच निकलते हैं।
हाल ही में खाद्य सुरक्षा विभाग ने बाजार से हल्दी, मिर्च पाउडर और अन्य मसालों के सैंपल लेकर जांच के लिए भोपाल लैब भेजे हैं। अधिकारियों का कहना है कि रिपोर्ट आने के बाद संबंधित फर्मों के खिलाफ खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम के तहत कार्रवाई की जाएगी।
लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि करोड़ों की आबादी वाले जिले में पूरे साल में केवल लगभग 30 नमूने लेना क्या पर्याप्त है? उपभोक्ता संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि विभाग की कार्रवाई सिर्फ दिखावे तक सीमित है।
कानून सख्त, लेकिन कार्रवाई नरम
खाद्य पदार्थों में मिलावट रोकने के लिए Food Safety and Standards Act, 2006 के तहत कड़ी कार्रवाई का प्रावधान है। वहीं भारतीय दंड संहिता की धारा 272 और 273 के अनुसार मिलावटी खाद्य सामग्री बेचने पर छह महीने तक की सजा और जुर्माना हो सकता है।
इसके बावजूद ज्यादातर मामलों में आरोपियों पर केवल आर्थिक दंड लगाया जाता है। कई मामलों में व्यापारी जुर्माना भरकर दोबारा वही कारोबार शुरू कर देते हैं। इससे मिलावट के खिलाफ सख्त संदेश नहीं जा पाता।
“कार्रवाई कम, समझौते ज्यादा” के आरोप
स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई मामलों में जांच और कार्रवाई के नाम पर अंदरखाने समझौते हो जाते हैं। यही वजह है कि बड़े स्तर पर मिलावट करने वाले कारोबारी शायद ही कभी जेल पहुंचते हैं।
खाद्य सुरक्षा विभाग का दावा है कि लगातार निगरानी की जा रही है और संदिग्ध खाद्य सामग्री की जांच कराई जा रही है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक नियमित सैंपलिंग, त्वरित जांच और कड़ी दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी, तब तक मिलावट पर प्रभावी रोक लगाना मुश्किल रहेगा।

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