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थिएटर के लिए रुपए जुटा सकें इसलिए उत्पल दत्त ने किया फिल्मों में काम…पिता, ससुर, मकान मालिक और बॉस के रोल में फेमस हुएUtpal Dutt worked in films to raise money for theatre… He became famous for his roles as a father, father-in-law, landlord and boss.

 

परिक्षित गुप्ता

बड़ी-बड़ी आंखें, घनी मूंछें और गहरी आवाज ने उत्पल दत्त को स्क्रीन पर एक खलनायक जैसा रूप दे दिया. मगर जैसे ही वह डायलॉग बोलते, दर्शकों की हंसी फूट पड़ती. उत्पल दत्त अभिनय की गंभीरता में हास्य का अनोखा मिश्रण भरने वाले बेहद कम कलाकारों में से एक थे. गंभीर चेहरे पर हल्की मुस्कान और उनके मशहूर ‘अच्छा…’ जैसे शब्द किरदार में जान डाल देते थे. दिल से अभिनय करने वाले इस महान कलाकार की 29 मार्च को जयंती है. उन्हें अभिनय का जादूगर कहना बिल्कुल सही होगा. हिंदी और बांग्ला सिनेमा के दिग्गज अभिनेता उत्पल दत्त मुख्य रूप से रंगमंच के प्रेमी थे. उन्होंने कहा था कि फिल्मों में इसलिए काम करते हैं ताकि थिएटर करने का खर्चा निकाल सकें. 


पिता, ससुर, मकान मालिक या दफ्तर के बॉस के रोल में हुए फेमस


उत्पल दत्त एक ऐसे अभिनेता थे जिनके लगभग हर किरदार यादगार बन गए. वह अभिनय को अपनी जीवन शैली बना चुके थे. चाहे हिंदी हो या बांग्ला सिनेमा, वह हर भूमिका में सहजता से समा जाते थे. जब वह हिंदी फिल्मों में आए तब उनकी उम्र ऐसी थी कि नायक के रोल नहीं मिल सकते थे. इसलिए वे चरित्र भूमिकाएं निभाते थे. चरित्र भूमिकाएं निभाना सबसे बड़ी चुनौती होती है, क्योंकि आम दर्शक पिता, ससुर, मकान मालिक या दफ्तर के बॉस जैसे किरदारों को और उन्हें निभाने वाले कलाकार को आसानी से याद नहीं रख पाते लेकिन उत्पल दत्त अभिनय के विराट स्कूल थे. उनकी तीखी आंखें, भौंहों का उतार-चढ़ाव, होंठों की थर्राहट और चेहरे के हाव-भाव दर्शकों को मोहित कर देते थे. 

नाटकों में किया अभिनय

उत्पल दत्त 40 के दशक में वह नाटक निर्देशक जेफ्री कैंडल के रंगमंच समूह से जुड़े और शेक्सपियर के अंग्रेजी नाटकों में अभिनय किया. 1949 में उन्होंने अपना नाट्य समूह बनाया और फिर इप्टा से जुड़े. उन दिनों वह बंगाल में नुक्कड़ नाटकों में काम करते थे. बाद में उन्होंने अंगार, कल्लोल, दिन बदलेर पाला, तीवेर तलवार, बैरिकेड और दुस्वप्नेर नगरी जैसे कालजयी नाटकों में अभिनय किया. उनका फिल्मी सफर 1950 में बांग्ला फिल्म ‘माइकल मधुसूदन दत्त’ से शुरू हुआ, जिसमें उन्होंने अभिनय के साथ निर्देशन भी किया. यह फिल्म 19वीं सदी के प्रसिद्ध कवि और नाटककार माइकल मधुसूदन दत्त की जिंदगी पर आधारित थी. इसके बाद वे 19 साल तक बांग्ला फिल्मों में सक्रिय रहे. उनकी कुछ यादगार बांग्ला फिल्में हैं- पालक, भालू बासा दत्ता, हीरक राजा आदेशे, अमानुष, जन अरण्य और वैशाखी मेघ. 

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