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ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच 19 वें दिन भी जारी है। अभी तक आंकड़ों और जमीनी हकीकत को अगर देखा जाए तो ये कहना गलत नहीं होगा कि युद्ध का पलड़ा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के पक्ष में झुकता हुआ नजर आ रहा है। ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के तहत ईरान के सैन्य ढांचे को भारी चोट पहुंचाई गई है। इजराइल का दावा है कि उसने ईरान के उस सुरक्षा चक्र को तोड़ दिया है जो उसे देश और विदेश की सत्ता को टिकाए रखता था।
सैन्य सफलता बनाम जमीनी हकीकत
युद्ध के शुरुआती दौर में ही ईरान को अपूरणीय क्षति हुई है। सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई समेत शीर्ष नेतृत्व और कई बड़े सैन्य कमांडर मारे जा चुके हैं।
ईरान के मिसाइल लॉन्चर और कमांड सेंटर मलबे में तब्दील हो चुके हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि युद्ध केवल हथियारों की गिनती से नहीं, बल्कि सहनशक्ति और आर्थिक स्थिरता से जीते जाते हैं।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल
भले ही अमेरिका आसमान में ताकतवर दिख रहा हो, लेकिन जमीन पर इसके आर्थिक नतीजे डराने वाले हैं। युद्ध शुरू होने के बाद से कच्चे तेल के दाम लगभग 45% तक बढ़ गए हैं। दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक रास्ता बंद होने की कगार पर है, जिससे 1970 के दशक के बाद का सबसे बड़ा ऊर्जा संकट पैदा हो गया है।
ईरान की 'अदृश्य' रणनीति
विश्लेषकों के अनुसार, ईरान को यह युद्ध जीतने के लिए अमेरिका को हराने की जरूरत नहीं है। उसकी रणनीति तीन स्तंभों पर टिकी है: भूगोल, समय और अनिश्चितता। ईरान का मकसद ट्रंप पर इतना दबाव बनाना है कि उनकी सैन्य सफलता एक अंतहीन और खर्चीले संघर्ष में बदल जाए। तेहरान हार मानने के बजाय युद्ध को लंबा खींचकर वैश्विक बाजारों और अमेरिकी जनता को बेचैन करना चाहता है।
सहयोगियों के साथ बढ़ती दूरियां
इस युद्ध ने राष्ट्रपति ट्रंप और उनके पारंपरिक सहयोगियों के बीच दरार भी पैदा कर दी है। जर्मनी, ब्रिटेन और लक्जमबर्ग जैसे देशों ने इस संघर्ष में अमेरिका का साथ देने या अपनी सेना भेजने से साफ इनकार कर दिया है।
सहयोगियों के इस रुख से ट्रंप की नाराजगी उनके सोशल मीडिया बयानों में साफ झलकती है, जहां उन्होंने यहां तक कह दिया कि उन्हें "किसी की मदद की ज़रूरत नहीं है। लेकिन कूटनीतिक जानकारों का कहना है कि बिना अंतरराष्ट्रीय गठबंधन के, यह अभियान एकतरफा जुआ साबित हो सकता है।

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