Top News

जब मरने से पहले दिए गए बयान के रूप में सीधा सबूत मौजूद हो तो मकसद अहम नहीं: सुप्रीम कोर्टWhen direct evidence in the form of a dying declaration is available, motive is not important: Supreme Court

 

सुप्रीम कोर्ट ने एक आदमी को अपनी पत्नी की हत्या के लिए दोषी ठहराने का फैसला बहाल कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब मरने से पहले दिए गए बयान जैसे साफ और भरोसेमंद सीधे सबूत हों तो मकसद का न होना अभियोजन पक्ष के लिए नुकसानदायक नहीं होता। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए कहा, "मकसद मुख्य रूप से उन मामलों में अहम होता है, जो हालात के सबूतों पर आधारित होते हैं। जहां एक भरोसेमंद और विश्वसनीय मरने से पहले दिए गए बयान के रूप में सीधा सबूत होता है, वहां मकसद का पक्का सबूत न होना अभियोजन पक्ष के मामले के लिए नुकसानदायक नहीं होता।"


हाईकोर्ट ने 2014 में आरोपी को बरी करते हुए अभियोजन पक्ष के मामले पर इस आधार पर सवाल उठाया कि मकसद साबित नहीं हुआ। अभियोजन पक्ष का मामला था कि प्रतिवादी नंबर 1, पति ने अपनी पत्नी को आग लगा दी, जिससे उसकी मौत हो गई। पत्नी ने एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में मरने से पहले बयान दर्ज कराया, जिसमें उसने अपने पति का नाम लिया और उस पर आग लगाने का आरोप लगाया। 

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के हत्या के दोषी ठहराने का फैसला यह तर्क देते हुए पलट दिया कि पति-पत्नी के बीच किसी भी लंबित मुकदमे की अनुपस्थिति से दुश्मनी की कमी दिखती है और अभियोजन पक्ष यह समझाने में विफल रहा कि आरोपी ऐसा गंभीर काम क्यों करेगा। हाईकोर्ट के फैसले से असहमत होते हुए जस्टिस महादेवन द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि जब अपराध साबित करने वाला सीधा सबूत हो तो मकसद साबित करना जरूरी नहीं होगा। चूंकि मृतक का मरने से पहले दिया गया बयान लगातार है, जो प्रतिवादी नंबर 2 के खिलाफ सीधा सबूत है, इसलिए कोर्ट ने माना कि मकसद साबित करना अहम नहीं रह गया। कोर्ट ने कहा, "मौजूदा मामले में रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों से पता चलता है कि प्रतिवादी मृतक के साथ अक्सर झगड़े, अपमान और मौखिक दुर्व्यवहार करता था, जिसमें उसे 'कंजरी' कहना और बार-बार उसे ससुराल छोड़ने के लिए कहना शामिल था।

 मरने से पहले दिए गए बयान में ही लगातार वैवाहिक कलह और दुर्व्यवहार का जिक्र है, जिससे अपराध करने के लिए एक संभावित पृष्ठभूमि मिलती है। किसी भी स्थिति में अभियोजन पक्ष को गणितीय सटीकता के साथ मकसद साबित करने की आवश्यकता नहीं है। मकसद को निर्णायक रूप से साबित करने में विफलता एक अन्यथा विश्वसनीय और ठोस मामले को कमजोर नहीं करती है।" कोर्ट ने आगे कहा, "इसलिए हमारी राय है कि हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के अच्छे-खासे तर्क वाले दोषसिद्धि का फैसला पलटकर साफ गलती की, क्योंकि उसने अपील में दखल के तय सिद्धांतों के खिलाफ जाकर सबूतों का फिर से मूल्यांकन किया।" नतीजतन, अपील मंजूर कर ली गई और प्रतिवादी नंबर 1, पति को सरेंडर करने और बची हुई सज़ा काटने का आदेश दिया गया।

Post a Comment

Previous Post Next Post