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बहन जी, सरकार को आपकी चिंता है... बस आपकी नहीं!"Sister, the government is concerned about you… just not you!”

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प्रणव बजाज

"मोहन राज में परिवार नियोजन का पुनर्जन्म"

मध्य प्रदेश में दो-बच्चे वाले नियम को हटाने का फैसला हुआ तो सबसे पहले महिलाओं ने एक-दूसरे को देखा। फिर सरकार को देखा। फिर दोबारा सरकार को देखा।


कारण साफ था। हर बार जब जनसंख्या, परिवार या बच्चों की बात होती है, तो चर्चा नीति की होती है, भाषण नेताओं के होते हैं, लेकिन असली जिम्मेदारी महिलाओं के हिस्से आ जाती है।

सरकार कहती है कि यह कर्मचारियों को राहत देने वाला फैसला है। महिलाओं का सवाल है—राहत किसे? क्योंकि गर्भधारण का अवकाश सरकार नहीं लेती, प्रसव पीड़ा सरकार नहीं झेलती, करियर में रुकावट सरकार के मंत्रियों की नहीं आती।

वर्षों तक "छोटा परिवार-सुखी परिवार" का पाठ पढ़ाया गया। अब वही पाठ्यपुस्तक शायद पुराने कबाड़ में रख दी गई है। जिन महिलाओं ने परिवार नियोजन को जिम्मेदारी समझकर अपनाया, वे सोच रही हैं कि क्या नीतियां भी अब मोबाइल ऐप की तरह अपडेट होती हैं?

सबसे दिलचस्प बात यह है कि नीति बदलने से पहले किसी ने यह नहीं बताया कि महिलाओं की स्वास्थ्य सुविधाएं कितनी बढ़ीं, मातृत्व अवकाश कितना बेहतर हुआ, आंगनबाड़ी व्यवस्था कितनी मजबूत हुई या कामकाजी माताओं के लिए क्या नई सुविधाएं आईं।

ऐसा लगता है कि सरकार ने समीकरण तो बदल दिया, लेकिन गणित की कॉपी महिलाओं के हाथ में ही छोड़ दी।

गांव की एक महिला ने बड़ा सीधा सवाल पूछा—"बच्चों की संख्या पर नियम हटाने से पहले सरकार यह तो बताए कि बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और पोषण की जिम्मेदारी कौन बढ़ाएगा?"

इस सवाल का जवाब अभी तक किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं मिला।

राजनीति में फैसले बदलते रहते हैं, लेकिन एक सच नहीं बदलता—किसी भी जनसंख्या नीति का सबसे बड़ा प्रभाव महिलाओं पर पड़ता है। इसलिए बहस बच्चों की संख्या पर नहीं, महिलाओं के अधिकार, स्वास्थ्य और सम्मान पर होनी चाहिए।

बाकी सरकारें आती-जाती रहेंगी, लेकिन हर नीति का बोझ आखिरकार उसी महिला के कंधों पर पड़ता है, जिसे अक्सर निर्णय लेने की मेज पर सबसे आखिर में जगह मिलती है। :::

यह व्यंग्य महिलाओं के दृष्टिकोण और नीतिगत सवालों पर केंद्रित है, न कि किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में अभियान चलाने पर।

विपक्ष पूछ रहा है कि आखिर इस बदलाव के पीछे मंशा क्या है? सरकार कह रही है कि यह कर्मचारियों के हित में है। जनता सोच रही है कि अगर हर 20-25 साल में नीति उलटी होनी है, तो अगली पीढ़ी को कौन सा नारा याद कराया जाए?

कहीं ऐसा तो नहीं कि भविष्य में नया स्लोगन आए—

"परिवार आपका, फैसला आपका, सरकार का विचार अवसरानुसार।"

राजनीति में स्थायी केवल एक चीज होती है—बदलाव। बाकी नारे, नियम और सिद्धांत तो मौसम की तरह आते-जाते रहते हैं।

और जनता?

वह आज भी यह समझने की कोशिश कर रही है कि आखिर सही कौन था—2001 वाली सरकार या 2026 वाली सरकार!

यह व्यंग्य राजनीतिक टिप्पणी है, तथ्यात्मक आरोप नहीं। इसमें नीति परिवर्तन पर सवाल और हास्यात्मक कटाक्ष केंद्र में हैं।

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